एकताल, छत्तीसगढ़ के ग्राम एकताल में परियोजना प्रमुख श्रीमती रश्मि स्वर्णकार और जिंदल स्टील और जिंदल फाउंडेशन के संयुक्त तत्वावधान में 14 जनवरी से 30 जनवरी 2026 तक डोकरा शिल्पीयों को प्रषिक्षण प्रदान किया गया। यह प्रशिक्षण नवीन तकनीकों की जानकारियों के साथ अपनी आजीविका को और अधिक सशक्त बनाने के लिये एक बेहतर मार्केटिंग तकनीकों की जानकारी प्रदान करने के लिये आयोजित किया गया।इस प्रशिक्षण में 9 स्व सहायता समूह के 120 पुरूष और महिलाओं ने सम्मिलत होकर प्रशिक्षण प्राप्त किया।
क्या है डोकरा शिल्प ?
डोकरा शिल्प भारत की प्राचीन और समृद्ध धातु कला का प्रतीक है, जो “लॉस्ट वैक्स तकनीक” पर आधारित होता है। यह शिल्प कला सदियों से आदिवासी समुदायों द्वारा पीढ़ी-दर-पीढ़ी से संरक्षित की जा रही है। डोकरा शिल्प की विशेषता इसकी हस्तनिर्मित बनावट, पारंपरिक आकृतियाँ और प्राकृतिक सौंदर्य है, जिसके कारण आज यह कला राष्ट्रीय स्तर पर ही नहीं, बल्कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी पहचान बना चुकी है।
प्रकृति की गोद में बसा हुआ है ग्राम एकताल
ग्राम एकताल प्रकृति की गोद में बसा आदिवासी बहुल ,एक ऐतिहासिक और सांस्कृतिक रूप से समृद्ध गांव है। यह गांव अपनी पारंपरिक शिल्प कला और ग्रामीण आजीविका के लिए जाना जाता है। यहां के डोकरा शिल्पी अपनी कला के माध्यम से सांस्कृतिक विरासत को सहेज कर जीवंत बनाए हुए हैं।नवीन
तकनीकों, लागत प्रबंधन ,बेहतर मार्केटिंग पर किया गया फोकस
ग्राम एकताल में हुए आयोजित इस प्रशिक्षण में शिल्पियों को डोकरा शिल्प की नवीन तकनीकों, लागत प्रबंधन, उत्पाद नवाचार और विपणन रणनीतियों का व्यावहारिक प्रशिक्षण दिया गया। प्रशिक्षण का उद्देश्य केवल तकनीकी ज्ञान तक सीमित न होकर शिल्पियों को आत्मनिर्भर बनाना और उन्हें बदलते बाजार की आवश्यकताओं के अनुरूप तैयार करना था।
आयोजित डोकरा शिल्प प्रशिक्षण कार्यक्रम ने पारंपरिक कला को आधुनिक बाजार से जोड़ने की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल की। यह प्रशिक्षण जिंदल स्टील और जिंदल फाउंडेशन के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित किया गया, जिसका मुख्य उद्देश्य डोकरा शिल्पियों को आधुनिक तकनीकों और बेहतर विपणन ज्ञान से जोड़कर उन्हें उनकी कला का उचित मूल्य दिलाना रहा।
“डोकरा शिल्प केवल आजीविका का साधन नहीं, बल्कि हमारी सांस्कृतिक पहचान है“ परियोजना प्रमुख श्रीमती रश्मि स्वर्णकार"
परियोजना प्रमुख श्रीमती रश्मि स्वर्णकार की इस प्रशिक्षण कार्यक्रम की सफलता में महत्वपूर्ण भूमिका रही। उनके कुशल नेतृत्व, जमीनी समझ और शिल्पियों के प्रति संवेदनशील दृष्टिकोण ने इस प्रशिक्षण को एक प्रेरणादायक अभियान का रूप दिया। उन्होंने प्रशिक्षण को केवल एक औपचारिक प्रक्रिया न मानते हुए इसे शिल्पियों के जीवन में सकारात्मक बदलाव लाने का माध्यम बनाया।
श्रीमती रश्मि स्वर्णकार ने शिल्पियों को संबोधित करते हुए कहा कि “डोकरा शिल्प केवल आजीविका का साधन नहीं, बल्कि हमारी सांस्कृतिक पहचान है। जब परंपरा और आधुनिक सोच एक साथ चलती हैं, तब शिल्पी आत्मनिर्भर बनते हैं और उनकी कला को उसका सही सम्मान मिलता है।” उन्होंने शिल्पियों को परंपरागत तकनीकों के साथ नवीन तकनीको को भी आजमाने के लिए प्रोत्साहित करते हुए यह भी कहा कि “आज का बाजार गुणवत्ता और कहानी दोनों चाहता है। अगर शिल्पी अपनी कला की कहानी को समझेंगे और सही तरीके से प्रस्तुत करेंगे, तो उन्हें बेहतर मूल्य और स्थायी बाजार दोनों मिलेंगे।”
जिंदल फाउंडेशन द्वारा ग्रामीण एवं आदिवासी क्षेत्रों में आजीविका संवर्धन के लिए किए जा रहे प्रयासों के अन्तर्गत , जिंदल सीएसआर के आजीविका कार्यक्रम प्रमुख श्री देवेंद्र दुबे के मार्गदर्शन और निर्देशन में इस प्रशिक्षण को रोजगारोन्मुखी स्वरूप प्रदान किया गया,साथ ही यह सुनिश्चित किया कि प्रशिक्षण के बाद शिल्पियों को बाजार से जुड़ने के ठोस अवसर मिल सकें।
जनप्रतिनिधिंयो की रही सक्रिय भूमिका
इस कार्यक्रम के सफल आयोजन में ग्राम एकताल के सरपंच श्री हिमांशु चौहान और उपसरपंच श्री सुंदर झारा का संरक्षण और सक्रिय सहयोग सराहनीय रहा। स्थानीय नेतृत्व के सहयोग से प्रशिक्षण को व्यापक सहभागिता और सामुदायिक समर्थन मिला।
प्रशिक्षण का संचालन प्रगति प्रयास सामाजिक संस्था, दंतेवाड़ा (छत्तीसगढ़) द्वारा किया गया। संस्था ने स्थानीय परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए प्रशिक्षण को व्यवहारिक और सरल बनाया, जिससे सभी प्रतिभागियों को विषयवस्तु को समझने और अपनाने में आसानी हुई।
ग्राम एकताल में आयोजित यह डोकरा शिल्प प्रशिक्षण कार्यक्रम ग्रामीण और आदिवासी बहुल क्षेत्रों में स्वरोजगार को बढ़ावा देने की दिशा में एक प्रभावी कदम सिद्ध होगा। जिंदल फाउंडेशन, जिंदल स्टील, सामाजिक संस्था और स्थानीय समुदाय के सामूहिक प्रयासों से पारंपरिक डोकरा शिल्प को नई ऊर्जा और नई पहचान मिलेगी।प्रषिक्षण के माध्यम से किये जाने वाले ऐसे प्रयास न केवल सांस्कृतिक धरोहर को संरक्षित करते हैं, बल्कि आत्मनिर्भर भारत के सपने को भी साकार करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।













