राष्ट्रीय

बिलकिस बानो केस में जो हुआ, वो कोर्ट, सरकार और समाज सबके लिए शर्मिंदगी का कारण



गुजरात और केंद्र ने जानबूझकर मूंद ली आंखें

विभिन्न कोर्टों और एनएचआरसी ने समय-समय पर गंभीर मामलों, खास तौर से यौनिक हिंसा के दोषियों की सजाओं को माफ न करने की हिदायत दी हुई है। इनकी अनदेखी किसी तरह मान भी लें, तब भी गुजरात और केन्द्र सरकारों ने अपने ही नीतिगत फैसलों को लेकर किस तरह आंखें मूंद लीं, इसे समझने के लिए रॉकेट साइंस के ज्ञान की जरूरत नहीं है। 2013 में जब नरेन्द्र मोदी गुजरात के मुख्यमंत्री हुआ करते थे, तब राज्य सरकार ने 1992 की सजा माफी नीति में बदलाव किया और बलात्कार के आरोपियों और दोषियों को किसी किस्म की राहत के प्रावधान को समाप्त कर दिया था।

अभी जून, 2022 में केन्द्र सरकार ने आजादी के 75 साल पूरे होने पर जेल से रिहाई के संबंध में जो निर्देश राज्य सरकारों को जारी किए, उसमें भी बलात्कार के आरोपियों और दोषियों को माफी नहीं देने की बात कही गई थी। ऐसे में, इस बात पर आश्चर्य करने की जरूरत नहीं लगती कि मोदी या केन्द्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने बिलकिस बानो मामले में अब तक एक शब्द भी बोलने की जरूरत क्यों नहीं समझी है!

वैसे भी, इंडियन एक्सप्रेस ने इनमें से कई दोषियों को बेटे की शादी, मां की सर्जरी आदि के नाम पर नियमित पैरोल या फरलो दिए जाने की रिपोर्ट दी है। इस सिलसिले में अधिकांश अनुरोध जिला प्रशासन से किए गए जो उन्हें जेल से बाहर निकलने की सुविधा उपलब्ध कराने में दरियादिली दिखाता रहा। लेकिन जब कभी जिला प्रशासन ने इस किस्म की सुविधा नहीं दी और उन लोगों ने कोर्ट में याचिका दी, तो अधिकांशतः उन्हें यह सुविधा नहीं ही मिली।

इस मुकदमे में दोषी पाया गया राधेश्याम शाह दबंग माना जाता है। उसने ‘गृह प्रवेश समारोह’ में भाग लेने के लिए 28 दिनों के लिए पैरोल का अप्रैल, 2022 में निवेदन किया। गुजरात हाई कोर्ट के न्ययायाधीश एस.एस. सेफिया ने इसे यह कहते हुए ठुकरा दिया कि शाह 29 जनवरी से 30 मार्च के बीच 60 दिन पैरोल पर गुजार चुका है। एक अन्य दोषी- केशर वोहानिया ने अपने बेटे की शादी में भाग लेने के लिए पैरोल की मांग की। मई, 2019 में गुजरात हाई कोर्ट के न्यायाधीश उमेश त्रिवेदी ने इस निवेदन को ठुकरा दिया। उन्होंने कहा कि वह सितंबर, 2018 और फरवरी, 2019 के बीच के छह महीनों में 90 दिन पैरोल पर रह चुका है।



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