छत्तीसगढ़

उत्तर प्रदेश: शर्तिया बछिया पैदा करने की योजना फ्लॉप, अब कृत्रिम गर्भाधान से दूध की गंगा बहाने का ढिंढोरा



वैसे, अभियान के लिए बड़ी बाधा सरकार ने पहले से खुद ही तैयार कर रखी है। गोरखपुर के एनेक्सी भवन में दुग्ध विकास, मत्स्य विभाग, पशुधन के मुख्य सचिव डॉ. रजनीश दूबे की मौजूदगी में 12 नवंबर को जब बैठक हो ही रही थी, तब ही पैरावेट्स ने बकाया भुगतान को लेकर विरोध दर्ज कराया। पशु मित्र वेलफेयर एसोसिएशन के बुंदेलखंड अध्यक्ष राजेश सिंह पटेल का कहना है कि ‘जोखिम वाले एक गर्भाधान के लिए 50 रुपये मिलने हैं। लेकिन पिछले कुछ महीनों से करोड़ों रुपये के बकाये का भुगतान नहीं किया गया है।’

वहीं पैरा वेटनरी वर्कर संघ, अयोध्या के महामंत्री हरिशंकर वर्मा का कहना है कि ‘वर्ष 2016 में पैरावेट्स के भुगतान के लिए 20 करोड़ रुपये जारी हुए थे। इनमें से 13 करोड़ रुपये सिर्फ सोनभद्र और हरदोई में बांट दिए गए जबकि 7 करोड़ अब भी सरकारी खजाने में ही हैं। सरकार के पास पशुओं का यूनीक आईडी नंबर से लेकर पशुपालकों का आधार नंबर कम्प्यूटर में है। कोई आश्चर्य नहीं कि जिम्मेदार कम्प्यूटर में गोलमाल कर लक्ष्य पूरा कर दें।’

पशुधन प्रसार अधिकारी संघ के प्रदेश अध्यक्ष नितिन सिंह कहते हैं कि ‘राष्ट्रीय कृषि आयोग के अनुसार, 5,000 पशुओं पर एक पशुचिकित्सालय का मानक है लेकिन यूपी में 21,000 पशुओं पर भी एक चिकित्सालय नहीं है। प्रदेश में 205.66 लाख गोवंशीय, 306.25 लाख महिषवंशीय के साथ लाखों अन्य पशुओं का इलाज भगवान भरोसे ही हो रहा है।’

वैसे, एक और बात। देश में दूध के उत्पादन में पहले नंबर पर होने का दावा करने वाले यूपी में पिछले कुछ दिनों से अमूल, पराग और ज्ञान जैसी नामी कंपनियों के मक्खन गायब हैं। घी, क्रीम से लेकर चीज की भी किल्लत है।



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