छत्तीसगढ़

‘उर्दू सिर्फ मुसलमानों की नहीं, बल्कि पूरे देश की भाषा थी और रहेगी’ – जश्न-ए-रेख्ता में उर्दू पत्रकारिता पर गोष्ठी



बातचीत के दौरान सामने आया कि आजादी से पहले जो लोग उर्दू पढ़ और लिख सकते थे, उनके लिए ये उर्दू अखबार भारत में हो रही घटनाओं की जानकारी का मुख्य स्रोत थे। जफर आगा ने कहा, “उर्दू पत्रकारिता में प्रतिरोध और न्याय के लिए खड़े होने का गुण है। यह उर्दू पत्रकारों की आदत बन गई है और आज भी वैसी ही है।

पत्रकार नदीम सिद्दीकी ने महाराष्ट्र जैसे राज्यों में उर्दू भाषा और उर्दू पत्रकारिता की स्थिति के बारे में बात करते हुए कहा कि मराठी भाषा में कई शब्द उर्दू, फारसी और अरबी भाषाओं से लिए गए हैं और राजनीतिक शब्दों में भी उपयोग किए जाते हैं। उन्होंने कहा कि, “कई उर्दू अखबार जैसे इंकलाब, उर्दू टाइम्स और हिंदुस्तान आदि प्रकाशित हो रहे हैं लेकिन उनमें से शायद ही कोई प्रभाव डाल रहा है।“

इस मौके पर शाहिद सिद्दीकी ने कहा कि भारत के स्वतंत्रता संग्राम को समझने के लिए भगत सिंह और लाला राजपत राय जैसे नेताओं के पत्र और लेख पढ़ने की जरूरत है, जिन्होंने ज्यादातर उर्दू में लिखा था। इसलिए, उर्दू मुसलमानों की भाषा नहीं है, बल्कि पूरे भारत की भाषा है। उर्दू भारत की आज़ादी की भाषा थी, उर्दू सबसे धर्मनिरपेक्ष भाषा थी और उर्दू पत्रकारिता के माध्यम से अमीर-गरीब लोगों की कहानियाँ सामने आती थीं।



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