छत्तीसगढ़

जवाब तो मिलना चाहिए कि यह ‘एक्ट ऑफ गॉड है या एक्ट ऑफ फ्रॉड’ और भगवान ने चुनाव के वक्त क्या संकेत दिया है



दुखद घटना है, इस पर राजनीति नहीं होनी चाहिए, मोरबी ही नहीं, किसी भी दुर्घटना पर राजनीति नहीं होनी चाहिए, हां सवाल जरूर उठने चाहिए, जांच तेजी से होनी चाहिए, जिम्मेदारी तय होनी चाहिए, उस ब्रिज के रखरखाव और इसे आम लोगों के लिए खोलने की इजाजत देने वाले अधिकारियों को कटघरे में खड़ा करना चाहिए, लेकिन इस सब पर तो प्रधानमंत्री घटना के लगभग 24 घंटे गुजरने के बाद भी चुप ही हैं।

इतना ही काफी नहीं, प्रधानमंत्री तो गुजरात में ही हैं, तमाम कार्यक्रमों में शामिल भी हो रहे हैं, औपचारिकतावश इस दुर्घटना पर दुख भी जता रहे हैं, लेकिन वे इस पर कुछ नहीं बोल रहे हैं कि आखिर इस पुल को अचानक क्यों खोला गया, वह भी बिना सरकारी महकमे की इजाजत के? इस पर भी कुछ नहीं बोल रहे हैं कि आखिर जिस पुल पर एक बार में 50-60 लोगों को ही जाने की इजाजत थी, उस पर एक साथ 400-500 लोग कैसे पहुंच गए? यह भी नहीं बता रहे हैं कि इस पुल की देखरेख और इसे ऑपरेट करने का ठेका एक ऐसी कंपनी को क्यों दे दिया गया जिसे पुल के रखरखाव और ऑपरेट करने का कोई अनुभव ही नहीं था? इस पुल की मरम्मत तो इसीलिए कराई गई थी कि यह जर्जर हो गया था, तो फिर इसे पूरी तरह खोल क्यों दिया गया?

यह वे सवाल हैं जिनके जवाब गुजरात सरकार और प्रधानमंत्री को देने चाहिए। जवाब यह भी देने चाहिए कि यह एक्ट ऑफ गॉड है या एक्ट फ्रॉड, और भगवान ने चुनाव के मौसम में क्या संकेत दिया है?



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