राष्ट्रीय

किस्से गांधीजी की पदयात्राओं और प्रतिरोध के उस मजबूत धागे के जिनसे जुड़ता चला गया पूरा हिंदुस्तान



अगस्त में कलकत्ता के दंगों में पांच हजार लोग मारे गए और इसके छः सप्ताह बाद पूर्वी बंगाल के मुस्लिम बहुल नोआखाली में दंगे भड़क उठे। महात्मा गांधी ने वहां का दौरा करने का फैसला किया। अमीर हिन्दू तो इलाका छोड़कर भाग गए लेकिन गरीब मारे गए या फिर उनका धर्मांतरण कर दिया गया। बिहार में भी असर पड़ा, जवाबी हिंसा और हत्याएं हुईं, तनाव चरम पर था। लेकिन तभी गांधी ने अपने जीवन की परवाह न करते हुए गांव-गांव, घर-घर पहुंचने के लिए पैदल मार्च का फैसला ले लिया। गांधी तब 77 वर्ष के थे, नंगे पैर चलते, हर रात किसी नए गांव में बिताते, हर दिन प्रार्थना सभाएं करते, रामधुन बजाते और मुसलमानों-हिन्दुओं दोनों को संबोधित करते। उनके रास्ते में तमाम बाधाएं खड़ी की गईं। सड़कें खोद दी गईं, संकरे रास्तों पर रात में मिट्टी और गंदगी डाल दी जाती। लेकिन इससे क्या फर्क पड़ने वाला था! उन्हें तो रुकना नहीं था। हिन्दुओं की रक्षा के लिए सेना भेजने की मांग करने वालों को उनका जवाब था: ‘कायरों की रक्षा कोई भी पुलिस या सेना नहीं कर सकती’। आखिर उन्होंने अकेले दम पर शांति बहाल कराई। 

1,00,000 हिन्दू, मुस्लिम, सिख और ईसाई महिलाओं का अपहरण, धर्मांतरण या बलात्कार किया गया



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