टूटे रिश्ते से बे-वजुद हुई एक बेटी का अपने पिता से सुलगता सवालःआपकी आत्मजा होने पर गुमान करूँ या गुमनाम बनी रहूँ - सुरेंद्र वर्मा-ज़रीनाज़ अंसारी


आज की बात 16 June 2024 (248)
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Azaad-bharat News/बिलासपुर छत्तीसगढ़/पिता के हमसाए में अनगिनत जीने वाले अपने अपने शान शौकत के हिसाब से अपने पिता के लिए क़सीदे गढ़ने और सोसायटी के सामने फ़क़र के साथ फूले नहीं समाने वालों की तादाद बहुत जियादा है, बनिस्बत इससे बिलकुल ही अलहदा और उलट तलाक़, घरेलू हिंसा, दहेज प्रताड़ना, एवम दीगर वजहों से अलगाव हुए टूटे दाम्पत्य रिश्तों से जन्मे संघर्षरत संतानों को नजरंदाज भी किया गया है और दोयम भी समझा जाता है। पिता का इस संसार में वजुद रहने के बावजूद अपने पिता अपने अब्बा के मुहब्बत, लाड़दुलार, संरक्षण से महरूम और पिता के हमसाए से बे-वजुद होकर जीने की तकलीफ जाहिर करने वाले बेटे-बेटियाँ बिरले ही हैं अलबत्ता एक ऐसी बेटी की हिम्मत की सराहना के साथ उसकी शिनाख्त ख़ुफिया रखते हुए उससे हुई बातचीत का अंश अपने सुधि पाठकों में संग साझा कर रहे हैं साथ ही ऐसे पिताओं को सवालों के कटघरे में लाकर जवाब तलाशने की अहम जिम्मेदारी भी सुधि पाठकों को सौंपते हैं।


गुजिश्ता बचपन से उम्रदराज होने तक का सफर यूँ तो सभी के लिए यादगार तो होता ही है तभी तो पूरे सफर के दौरान आने-जाने वाले लोग सीखा भी जाते हैं, तो कुछ से सीख मिल जाती है। अलबत्ता इस दौर में एकअहम किरदार जो हर किसी के जीवन में दिशा-सूचक यंत्र सरीखे होता है वो है ‘‘पिता’’। हालाँकि दिशाहीन जिंदगी गुजारना अपने आप में चुनौती तो है ही तभी तो ऐसी चुनौती भरी जिंदगी के अंधेरे से उजाले तक आने वाली लड़की का नाम  है ‘‘दिशा’’


जन्म लेते ही दिशा ने स्वयं को अपनी माँ के इर्द-गिर्द महसूस किया। पिता का स्नेह भरा आलिंगन उसे कभी महसूस नहीं हुआ। हर छोटी-छोटी बात के लिए वो अपनी माँ पर निर्भर रहती थी। उसके माता-पिता की अर्न्तजातीय लव-मैरिज हुई थी। शुरू-शुरू में उन दोनों में बहुत प्रेम व स्नेह था। पर समय के साथ-साथ सब कुछ फीका पड़ता गया। उनके बीच लड़ाई-झगड़े होने लगे और उनका सीधा असर उसके पिता के व्यवसाय पर हुआ। उनका व्यापार ठप हो गया और वे दूसरे शहर में जाकर नौकरी करने लगे। परिवार में उनका सहयोग ना के बराबर था। इसलिए दिशा की माँ ने बाहर पार्लर में जाकर काम करने की सोची। एक तरफ छोटी सी दिशा और दूसरी तरफ घर की दशा ने उसकी माँ को ध्वस्त कर दिया। बेचारी दिशा अपने बचपन में ही अकेली पड़ गई। माँ को अकेले खटकते हुए देखती थी। अपने छोटे-छोटे शौक और ख्वाहिशों को मारकर ना जाने कब दिशा उम्र से ज्यादा बड़ी हो गई। पढ़ाई में अच्छी होने के कारण स्कूल में उसे सब पसन्द करते थे। उसका मन घर से ज्यादा स्कूल में लगा करता था। जैसे-जैसे बड़ी होती गई उसे पिता की याद सताने लगी। सालों बाद जब उसके पिता घर आये तो उसने उनका एक अलग ही रूप देखा। व्यापार तो उनका चला नहीं बल्कि ढेर सारी बुरी आदतें उनको लग गई। इन दिनों उसकी माँ के दोस्त थे जिनसे उसे थोड़ा स्नेह मिला। उसका झुकाव उनकी तरफ पिता की तरह होने लगा। वो उनकी पढ़ाई में भी मदद कर दिया करते थे। इसी वजह से 10वीं में दिशा ने मैरिट लिस्ट में नाम अर्जित किया। अब दिशा के पिता घर में ही रहते थे और घर के माहौल को बिगाड़ने का काम किया करते थे। इसी वजह से उसकी पढ़ाई प्रभावित हुइ और 11 में 70 प्रतिशत अंक ही प्राप्त हुए। उसके पितातुल्य अंकल ने 12वीं का भार अपने सर पर लिया और उसे अच्छे ट्यूशन दिलाये नतीजन 12वीं में उसने 95 प्रतिशत अंक पीसीएम में अर्जित किये। अब उसके सामने सबसे बड़ी चुनौती थी बाहर जाकर लॉ की पढ़ाई करने की। चूँकि बचपन से ही उसने अपने माता-पिता के लड़ाई-झगड़े को देखा था। तभी से वो अपना मन वकील बनने के लिए बना चुकी थी। लेकिन उसी समय उसके पिता ने उसकी शादी की बात सामने रख दी। उसको उससे छुटकारा पाना था। हालांकि दिशा की माता कार्यरत थी परन्तु फिर भी सिक्का उसके पिता का ही घर में चलता था क्योंकि अगर उनकी बात न मानो तो वे घर में कलेश किया करते थे। अब तक दिशा के मन में अपने पिता के लिए उतना अलगाव नहीं था आखिर वे पिता थे उसके। परन्तु 12वीं के बाद ही शादी की बात सुनकर जैसे उसके पाँव तले जमीन ही खीसक गई, पढ़ाई में इतने अच्छे अंक प्राप्त करने के बावजूद आगे पढ़ने से रोका जा रहा था। उसने हिम्मत करके अपने पिता से बात कि तो उसके जवाब में उसे दो थप्पड़ नसीब हुए। उसका मन अपने पिता की तरफ विद्रोह व रोष से भर गया। वो अपने अंकल के पास गई और उन्हें सब कुछ कह सुनाया। उसने अपने अंकल की मदद से क्लेट का फॉर्म भरा और अपनी मम्मी के साथ शहर 



छोड़कर दूसरी जगह रहने चली आई। ये उनके जीवन का एक अहम हिस्सा था। बसाबसाया घर और शहर छोड़कर दूसरी जगह शिफ्ट होना आसान नहीं था। उन दोनों के लिए उसके अंकल एक मसीहा साबित हुए। उन्होंने किराये का कमरा, उसकी माँ के लिए पार्लर में नौकरी सब अरेंज किया। दिशा भी क्लेट की तैयारी के साथ-साथ ट्यूशन पढ़ाने लगी थी। इस तरह से वे कठिनाइयों से भरा परन्तु शान्तिपूर्वक जीवन जीने लगे। उसके पिता ने बार-बार उनको धमकाया परन्तु वह बहादुर माँ-बेटी ने हार नहीं मानी। दिशा ने अपनी परीक्षा पास की और शहर के एक नामी लॉ-कॉलेज में दाखिला लिया। आज वही दिशा एक अच्छी वकील बनकर अपनी जीवन व्यतीत कर रही है। जीवन की इस मुकाम पर उसे एक समझने वाला व प्यार करने वाला जीवन साथी भी मिला। शादी का बुरा अंजाम देखने के बात उसकी हिम्मत नहीं थी शादी करने की। पर उसके जीवन के मेंटर उसके अंकल व माँ के समझाने पर उसने शादी की, माँ की नौकरी छुड़वाई, उन्हें अपने साथ रखा, उसके पिता आज भी वही पुराने शहर में पुराने घर में रह रहे है, पर उस माँ-बेटी को उनके होने ना होने से कोई मतलब नहीं। वे दोनों अब एक संतोषी जीवन व्यतित कर रहीं है। जीवन के हर कठिन रास्ते पर उसका हाथ थामने वाले, उसको रास्ता दिखाने वाले उसके अंकल ही पिता समान है और उसके लिए सब कुछ हैं। साथ ही दिशा ने अपने जैविक पिता के तलाक के कागज भी कोर्ट में लगाई हुई है।


देश के गुलाबी शहर में वकालत का पेशा अख़्तियार कर अपने जिरह अपनी पैरवी से कमतर लोगों को न्याय दिला कर नाम और गुमान  हासिल करने वाली दिशा की गुजरी जिंदगी को नजदीक से नेहार कर  चश्मदीद बनीं सँध्या से हुई बातचीत के लब्बोलुआब से यह जाहिर हुआ कि दिशा जैसी अनगिनत बेटियों की भी अपने पिता की छत्रछाया के चाहतों की तड़पन हद से बे-हद है। दिशा के दुर्दिन वक्त में मेंटर के रूप में मिले व्यक्ति को फरिश्ता से नवाजते हुए एवम दिशा के एडवोकेट जीवन साथी को भी दिशा और उनकी 55 वर्षीय माँ को अपना संरक्षण देकर आला दर्जे का इंसानियत बनने का मिसाल साबित करने के लिए फादर्स डे के मौक़े पर इन सभी अजीम किरदारों को इस्तक़बालिया सलाम अर्ज है। सहयोगी-टोपेश चन्द्र

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