छत्तीसगढ़

राजस्थान का ‘स्वास्थ्य का अधिकार’ विधेयक गरीबों के लिए रक्षा कवच, कई राज्यों को मिली दिशा



अर्थपूर्ण बात तो यह है कि स्वास्थ्य सेवाएं आर्थिक तौर पर वहन करने योग्य, ऐसी हों जो सब तक पहुंच सकें, जरूरत के वक्त मिल सकें और अच्छी गुणवत्ता वाली होनी चाहिए। ग्रामीण और दूरस्थ इलाकों में रहने वाली आबादी को इसकी सबसे ज्यादा जरूरत है। जहां वे रहते हैं, उसके पास सुविधाएं अगर नहीं मिल पाती हैं, तो उनके लिए स्वास्थ्य के अधिकार का बहुत मतलब नहीं है। इन सबका ध्यान रखा जाना जरूरी है।

यह तो बहुत ही साफ है कि निजी हो या सरकारी- भारत में स्वास्थ्य सुविधाएं अधिकतर खराब गुणवत्ता वाली हैं और उनमें अच्छी देखभाल नहीं होती। खराब गुणवत्ता वाली सेवाओं के अधिकार मददगार नहीं हैं। अपेक्षा की जाती थी कि विधेयक में सरकारी और सरकारी सहायता प्राप्त चिकित्सा केन्द्रों में स्तरीय गुणवत्ता को लेकर भी प्रतिबद्धता जताई जाती। वैसे, भारतीय सार्वजनिक स्वास्थ्य मानकों और राष्ट्रीय गुणवत्ता बीमा मानकों-जैसे मानक उपलब्ध हैं। विधेयक में गुणवत्ता वाले मानकों को विकसित करने की बात छोड़ दी गई है। जिस वजह से यह काफी अप्रभावी और अनिश्चित हो गई है।

इस किस्म की कुछ कमियों के बावजूद अभी जो हाल है, उसमें यह तो कहा ही जा सकता है कि अन्य राज्यों को इस किस्म के प्रावधानों को लेकर कुछ सबक लेने की जरूरत है और उन्हें स्वास्थ्य कानूनों में अधिकार की बातें जोड़नी चाहिए।

(डॉ. पवित्र मोहन राजस्थान में गैरलाभकारी प्राथमिक स्वास्थ्य सेवा केन्द्र- बेसिक हेल्थकेयर सर्विसेज के सहसंस्थापक हैं। नैना सेठ उदयपुर में आईआईएम में रिसर्च असिस्टेंट हैं।)



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