बॉलीवुड समाचार

यूं ही नहीं कोई ‘बिग बी’ बन जाता है! कठिन संघर्षों की आंच में तपकर ‘महानायक’ कहलाए अमिताभ बच्चन



अमिताभ बच्चन को सबसे पहले (1969 में ) पर्दे पर लाने वाली शख्सियत लेखक-निर्देशक ख़्वाजा अहमद अब्बास थे। हालांकि बच्चन की आवाज उसी साल की शुरुआत में मृणाल सेन की फिल्म ‘भुवन सोम’ में आ चुकी थी। राष्ट्रीयता की भावना से ओतप्रोत अब्बास की कहानी ‘सात हिन्दुस्तानी’ में अमिताभ पहली बार दिखे जहां सात भारतीय गोवा को पुर्तगालियों से मुक्त कराने की साजिश रचते हैं और अमिताभ इसमें कवि से क्रांतिकारी बने एक युवा के रूप में दिखे। ‘कवि से क्रांतिकारी’ भी उनकी बाद की भूमिकाओं के बयान का एक सटीक रूपक है। 1973 तक उन्होंने ज्यादातर स्थिर किरदार ही निभाए, मसलन एक डॉक्टर (आनंद) या एक कलाकार (परवाना) की भूमिकाएं। यह एक परिष्कृत, विद्वान घराने में पले-बढ़े और बाद में कलकत्ता की एक फर्म में 1,600 रुपये मासिक की नौकरी करने वाले उनके असल किरदार की वास्तविकता के काफी करीब था। 1973 के बाद का दौर उनके गुस्से और रोमांस की अदला-बदली का था। जंजीर के बाद के दो दशकों में दीवार, डॉन, काला पत्थर, कालिया, कुली, शहंशाह, अग्निपथ आदि में वह किसी मकसद की खातिर विद्रोही भूमिकाओं में दिखते हैं।

‘एंग्री यंग मैन’ वाली शैली ने मुख्य रूप से पुरुष दर्शकों को बच्चन को देखने का एक नया तरीका तो दिया ही, बच्चन के माध्यम से खुद को देखने का एक नया तरीका भी दिया। संघर्ष, महंगाई और प्रतिरोध के समय में यह कठिन श्रम के बावजूद शोषण का सामना करने वाले उस श्रमिक वर्ग की निराशा की आवाज बनता है जो अत्यंत दुरूह हालात में काम करते हैं। यह बताता है कि अगर ऊपर उठना है तो कानून से ऊपर उठना होगा। यहां एक तेवर वाला अमिताभ दिखता है। वह एक प्रकार की मर्दानगी को मूर्त रूप दे रहे थे जिसे आज हम जहरीला, नायिकाओं के इर्द-गिर्द घूमते बच्चन के रूप में देखते हैं ताकि बच्चन का नायक चमक सके।

बच्चन ने उस दौर के ‘नाजुक मिजाज’ नायक की छवि को भी तोड़ा। उनके बढ़े हुए बाल, घनी-मोटी कलमें और लंबे पैर कानून से भागने या दुश्मनों से बदला लेने का बेहतर हथियार तो बने ही राजेश खन्ना और शशि कपूर जैसे सुंदर-चिकने चेहरों के लिए एक चुनौती भी थे। उनके पात्रों की अपनी एक शैली थी जिसकी नकल करना आसान था और जिसके साथ एक अंतरंगता महसूस होती थी। डॉन के स्टाइल वाली बंडी और गमछा, शोले वाली डेनिम (जींस), शहंशाह की जंजीरों वाली आस्तीन एक स्टाइल स्टेटमेंट बन गए। यह भी पहली बार हुआ कि दर्शक हॉल से निकला तो अपने साथ कुछ पंचलाइनें भी लेता गया, मसलन: ‘डॉन को पकड़ना मुश्किल ही नहीं, नामुमकिन है’ या ‘आज मेरे पास बंगला है, गाड़ी है, बैंक बैलेंस है, तुम्हारे पास क्या है?’



Source link