छत्तीसगढ़

ऊपर-ऊपर शांति, पर अंदर-अंदर सुलग रहा है कश्मीर, दमन और कुंठा ने अविश्ववास की खाई को किया और चौड़ा



एलजी का ऑफिस

इमरान गिलानी की बात से समझ में आता है कि सामान्य चीजों के लिए भी लोगों को किस किस्म की दिक्कत हो रही है। वह बताते हैं कि कोई चुनी हुई सरकार तो है नहीं, सो ‘अधिकारी पहले की तुलना में कहीं अधिक हठी और मगरूर हो गए हैं और अधिकांश तो हममें से सबके लिए पहुंच से बाहर हैं। वैसे भी, हर कोई हर चीज के लिए तो उपराज्यपाल के पास जा नहीं सकता।’ जम्मू-कश्मीर व्यापार संघ के अबरार खान भी कहते हैं कि ‘जिस तरह स्थानीय विधायक तक जाया जा सकता था, एलजी के पास उस तरह की पहुंच तो है नहीं।’

इन लोगों का अनुमान है कि अगले चुनाव में भारी वोटिंग होगी। वैसे, पीडीपी के रऊफ बट्ट कहते हैं कि हर कोई आशंका जता रहा है कि चुनाव में धांधली होगी और कठपुतली शासन बिठा दिया जाएगा। फिर भी भारी वोटिंग होगी क्योंकि लोग ऐसा स्थानीय विधायक चाहेंगे जिस तक वे पहुंच सकें। अनंतनाग में रशीद डार कहते हैं कि इस किस्म की आशंकाएं बेवजह नहीं हैं। सज्जाद लोन, अल्तताफ बुखारी और अब गुलाम नबी आजाद को जिस तरह बढ़ाया गया है, वह शीशे की तरह साफ है। वह कहते हैं कि ‘अल्तताफ बुखारी को पैसे दिए गए, बड़ा ऑफिस दिया गया और सुरक्षा कवर दिया गया- ताकि वह अपनी पार्टी- जम्मू-कश्मीर अपनी पार्टी को स्थापित कर सकें।’ उन्हें संदेह नहीं है कि आजाद जैसे दूसरों को भी संसाधनों की कोई कमी नहीं होगी।

एनडीए गठबंधन में शामिल राष्ट्रीय लोक जनशक्ति पार्टी के प्रवक्ता संजय सर्राफ भी इस किस्म की आशंकाएं जताते हैं। वह घाटी में रहते हैं और कश्मीरी पंडितों के बीच प्रमुख स्वर माने जाते हैं। वह कहते हैं कि ‘राजनीतिक वर्ग के विरोध के बावजूद आम लोगों ने अगस्त, 2019 में बदलावों का विरोध नहीं किया और राज्य का विभाजन स्वीकार कर लिया। लेकिन लोन और बुखारी- जैसे लोगों को जिस तरह तवज्जो दी जा रही है, उससे आम प्रतिरोध पनप सकता है।’



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