छत्तीसगढ़

सरकारी बैंकों के निजीकरण पर उतारू सरकार, लेकिन कितना जरूरी है इन्हें निजी हाथों में सौंपना



सच्चाई यह है कि दोनों ही पेपर ने सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों में अक्षमताओं, कम लाभ और एनपीए को बताते हुए निजीकरण का समर्थन किया। गुप्ता और पनगढ़िया ने एसबीआई को छोड़कर सार्वजनिक क्षेत्र के सभी बैंकों के एक ही साथ निजीकरण की वकालत की जबकि आरबीआई शोधकर्ताओं ने पहले सार्वजनिक क्षेत्र के दो बैंकों के क्रमिक निजीकरण का समर्थन किया।

सरकारी बैंकों के निजीकरण का इरादा 2020 में सामने आया। और 2021-22 के केन्द्रीय बजट में केन्द्रीय वित मंत्री निर्मला सीतारमण ने बिना नाम लिए दो सरकारी बैंकों के विनिवेश की घोषणा की। जून में खबरें थीं कि नीति आयोग ने निजीकरण के लिए सार्वजनिक क्षेत्र के चार बैंकों के नाम चुने हैं। लेकिन तब से यह प्रक्रिया आगे बढ़ी नहीं लगती है। इस साल 18 जुलाई को वित्त मंत्री ने सरकारी स्वामित्व वाले बैंकों के निजीकरण की प्रतिबद्धता को पूरा करने की बात फिर की। तब भी इस दिशा में कदम बढ़ता नहीं दिख रहा।

नौकरियां जाने का खतरा

सरकार ने उन चार बैंकों के नाम नहीं बताए हैं, नीति आयोग ने जिनके निजीकरण के सुझाव दिए हैं। पर जिन्हें लेकर मीडिया रिपोर्टो में कयास हैं, उनमें से बैंक ऑफ इंडिया में 50,000, सेंट्रल बैंक ऑफ इंडिया में 33,000, इंडियन ओवरसीज बैंक में 26,000 और बैंक ऑफ महाराष्ट्र में 13,000 कर्मचारी हैं। ये बैंक यूनियनों की तरफ से बताए गए अनुमान हैं। बैंक ऑफ बड़ौदा के चीफ इकोनॉमिस्ट मदन सबनवीस इस सिलसिले में इस बात की ओर ध्यान दिलाते हैं कि जब सार्वजनिक क्षेत्र के तीन बैंकों का मर्जर हुआ, तो किसी की नौकरी नहीं गई। लेकिन जब निजी क्षेत्र किसी को लेगा, तो नौकरियां कम की जाएंगी। आप एयर इंडिया को ही देख लो जहां वीआरएस दिया जा रहा है।



Source link