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जिंदगी खत्म कर देने से समस्या खत्म नहीं होती : मानसिक तनाव अधिक हो तो करें अपनों से बात


रायगढ़ , आत्महत्या किसी समस्या का समाधान नहीं है फिर भी लोग मानसिक तनाव और अपने ही अंदर इतने घुटते रहते हैं कि उन्हें लगता है कि जीवन खत्म कर लेने से सब ठीक हो जाएगा पर ऐसा नहीं है। इसी को समझाने के लिए और आत्महत्या रोकथाम के लिए 10 सितंबर को विश्व आत्महत्या रोकथाम दिवस मनाया जाता है। इस साल की थीम क्रिएटिंग होप थ्रू एक्शन यानी गतिविधि के माध्यम से आशा का संचार करना है।

मेडिकल कॉलेज के मनोचिकित्सक डॉ. राजेश कुमार अजलगल्ले बताते हैं: ”प्रदेश में आत्महत्या की दर लगातार बढ़ रही है। इसका कारण सहनशीलता की कमी है क्योंकि जिंदगी ने रफ्तार पकड़ ली है और ठहराव की कमी है। मेडिकल कॉलेज में हर दिन 2-4 जहर खाने के मामले आते हैं। इसमें किसान, युवतियां, आर्थिक कारणों से परेशान लोग ज्यादा होते हैं। किसानों के पास कीटनाशक सदैव मौजूद होता है तो थोड़ी सी परेशानी होती है तो इसे पी लेते हैं। कीटनाशक के बेचने पर कोई प्रतिबंध नहीं है। आत्महत्या के प्रयास के बाद जो लोग बच जाते हैं उन्हें तब पछतावा होता है कि उन्होंने ऐसा क्यों किया। काश वह किसी से बात कर लेते तो आत्मघाती कदम नहीं उठाते। मानसिक तनाव अधिक हो अपनों से बात करें।“

वर्तमान समय में आत्महत्या को रोकने के प्रयासों को बढ़ाने की जरूरत इसलिए भी है क्योंकि कुछ मामलों में मासूम स्कूली बच्चे तक आत्महत्या कर रहे हैं। डॉ. राजेश अजगल्ले कहते हैं: “पालकों को अपने बच्चे का पूरा ख्याल रखना चाहिए। हैलीकॉप्टर पैरेंटिंग न हो पर बच्चा क्या कर रहा है क्या नहीं यह तो पता होना चाहिए। अन्यथा वह भीड़ में अकेला हो जाएगा और अपनी बात चाहे वह अच्छी हो या बुरी किसी को बता नहीं पाएगा और अपने में ही घुटता रहेगा। साथ ही बच्चे पर अत्यधिक दबाव किसी भी चीज के लिए नहीं डालें। पालक और बच्चे के बीच दोस्ताना संबंध होना चाहिए। जिससे बच्चे में कभी मानसिक तनाव आये भी तो बातचीत से वह दूर हो जाए।”

आत्महत्या समस्या का समाधान नहीं
राहुल और रिंकी (बदले हुए नाम) साथ पढ़ते थे। दोनों में अच्छी दोस्ती थी राहुल को रिंकी से एकतरफा प्यार हो गया और वह रिंकी से शादी करने की जिद करने लगा पर रिंकी ने शादी परिजनों की मर्जी के खिलाफ करने से मना कर दिया। राहुल ने इसे दिल पर ले लिया और जहर खाकर आत्महत्या की कोशिश की पर वह बच गया। मेडिकल कॉलेज में उसकी काउंसिलिंग शुरू हुई थी कि फिर उसने हाथ काटकर जान देने की कोशिश की। इस बार भी वह बच गया, फिर उसने अन्न-जल त्याग दिया। मनोचिकित्सक डा. राजेश अजगल्ले की काउंसिलिंग के बाद आज वह ठीक है और अपनी पढ़ाई शुरू कर दी है।

बकौल राहुल, ”वह पल जिंदगी का हिस्सा था पर जिंदगी नहीं। जिंदगी खत्म करने से समस्या नहीं खत्म होती। समस्या से लड़ना है तो जिंदा रहना है। मैंने बात की और अब मैं इन सब से निकल गया हूं। हालांकि इस सब में मैं डेढ़ साल पीछे हो गया हूं पर परिजनों और नियर-डियर को देखकर लगता है जब ये हैं तो कुछ मुश्किल नहीं।“