छत्तीसगढ़

चुनावी बॉन्ड बींध रहा लोकतंत्र, वोटरों के साथ चुनाव आयोग को भी बनाया जा रहा पंगु



शायद सरकार के दावे को इस तरह साधारण तरीके से विश्वसनीय बना सकता है कि चुनावी बॉन्ड कोई भी खरीद सकता है और अपनी इच्छा के मुताबिक किसी पार्टी को दान में दे सकता है। स्टेट बैंक इसकी गोपनीयता और राजनीतिक दलों के साथ परस्पर संबंध का दावा करता है, चुप्पी का नकाब बना रह सकता था। लेकिन सूची लीक हो गई और रिपोर्टर्स कलेक्टिव ने 105 में से कुछ पार्टियों से संपर्क किया तो स्पष्ट हो गया कि इनमें से अधिकांश ने चुनावी बॉन्ड से एक नया पैसा भी हासिल नहीं किया था। उन्होंने किया महज यह था कि उन्होंने यह भाव पैदा करने के लिए इसमें भाग लिया था कि वे इसमें शामिल हैं।

कलेक्टिव के असिस्टेंट एडीटर श्रीगिरीश जहिल ने 5 जनवरी, 2023 को एडीआर के वेबिनार में इस बारे में कुछ जानकारी दी। इन राजनीतिक दलों में असली ‘देसी पार्टी’ और ‘हम’ और आप पार्टी जैसे कुछ अनसुने नाम थे। एक का नाम तो ‘सबसे बड़ी पार्टी’ था। एक के पास कोई बैंक एकाउंट नहीं था। एक अन्य के बैंक खाते में सात सौ रुपये थे।

चुनावी बॉन्ड उस दंडमुक्ति के बारे में बताता है जिससे सत्ताधारी पार्टी चुनाव आयोग, रिजर्व बैंक, अपने कानून मंत्रालय, अपनी राज्य इकाइयों और नेताओं की अब अनदेखी कर सकती है। वे यह भी स्पष्ट करते हैं कि विपक्ष क्यों कमजोर होता जा रहा है। अगर पहले से ही अपूर्ण लोकतंत्र को और अधिक अलोकतांत्रिक और अपारदर्शी बनाना लक्ष्य है, तो यह ऐसा करने का और भी कुटिल तरीका हो सकता है।



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