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क्या फायनेंस कंपनी चैंक बाउंस कानून 138 का मुकदमा चला सकती हैं? मोटर वाहन जप्त होकर नीलाम हो गया, अब चैंक बाउंस का मुकदमा कैसे?


मोटर फायनेंस कंपनी वाहन ऋण देते समय अनुबंध पत्र हायर परचेज एग्रीमेंट तैयार करती हैं, हस्ताक्षर युक्त चैंक लेकर रख लेती हैं जो कि बाद में काम आता हैं। कंपनी का ग्राहक/ऋणी किसी कारण से डिफाल्ट हो जाता हैं, वाहन कि किश्त अदा नहीं कर पाता हैं, कंपनी नोटिस देती हैं, इसके बाद कंपनी वाहन को जप्त कर लेती हैं, वाहन को निलाम कर देती हैं।
फायनेंस कंपनी मोटर वाहन की नीलामी के बाद ऋणी व्यक्ति पर वसूली की कार्यवाही प्रारंभ करती हैं। सरफैसी एक्ट 2002 में कार्यवाही संभव हैं, मध्यस्थता एवं सुलाह अधिनियम 1996 में कार्यवाही संभव हैं, तीसरा कंपनी चैंक बाउंस कानून 1881 धारा 138 का मुकदमा पेश करती हैं। यह देखने में आया हैं कि जिला न्यायालय स्तर पर चैंक बाउंस कानून 138 में अंतिम निर्णय फायनेंस कंपनी के पक्ष में चला जाता हैं या फिर राजीनामा हो जाता हैं आपसी समझौता हो जाता हैं जिसमें फायनेंस कंपनी को ब्याज सहित वांछित धनराशि मिल जाती हैं। सबसे बड़ा नुक्सान आरोपी का होता हैं, जिसका वाहन हाथ से निकल गया, कंपनी ने जप्त कर निलाम भी कर दिया और बकाया धनराशि अदा करनी पड़ी थी।
न्यायिक दण्डाधिकारी प्रथम श्रेणी की अदालत में फायनेंस कंपनी द्वारा परिवाद पत्र धारा 138 परक्राम्य लिखत अधिनियम 1881 में पेश किया जाता हैं तब उन मामलों में महत्वपूर्ण तथ्यों को छिपाया जाता हैं। मसलन हायर परर्चेस एग्रीमेंट, ऋण खाता स्टेटमैंट, वाहन जप्ति पत्र, नीलामी पूर्व सूचना, वाहन निलामी पत्रक, ग्राहक को वाहन जप्ति पूर्व प्रेषित नोटिस, निलामी में प्राप्त धनराशि के दस्तावेज अमूमन जानबूझकर पेश नहीं किए जाते हैं। फायनेंस कंपनी संक्षिप्त परिवाद पत्र पेश करती हैं! उक्तानुसार दस्तावेजो से संबंधित तथ्यों को छिपाया जाता हैं। निचली अदालतों का एकरफा झुकाव भी कमोबेश फायनेंस कंपनी की तरफ ही देखने को मिलता है। जबकि चेक का अनादरित होना मात्र ही अपने आप में अपराध नहीं है।
फायनेंस कंपनी के मामलों में आरोपी का यह दोष होता हैं कि वाहन स्वामी होने के बावजूद उसने कंपनी के किसी भी नोटिस का जवाब नहीं दिया हैं। वाहन को रिकवरी ऐजेन्ट जप्त करके ले गए हैं लेकिन वाहन जप्ति के दस्तावेज वाहन स्वामी को नहीं दिए गए हैं। वाहन स्वामी ने पुलिस में बलपूर्वक वाहन जप्ति की रिपोर्ट भी नहीं की हैं। फायनेंस कंपनी के विरूद्ध उपभोक्ता फोरम में कोई वाद पत्र दाखिल नहीं किया हैं।
विचारण न्यायालय के समक्ष फायनेंस कंपनी के परिवाद पत्र में प्रति परीक्षण सरफैसी एक्ट 2002 से संबंधित भी करना चाहिए। आरोपी की ओर से यह स्थापित किया जाना चाहिए कि वाहन को कंपनी के द्वारा जप्त कर निलाम कर दिया गया हैं, इसके बाद चैंक अनादरण के अपराध का मुकदमा पेश किया गया हैं। इसके अतिरिक्त, प्रश्नगत् चैंक को पूर्व में हायर परर्चेस एग्रीमेंट तैयार करते समय कपंनी के कहेनुसार ही जारी किया गया था जिसका कि बाद में फायनेंस कंपनी द्वारा दुरूपयोग किया गया हैं। जबकि यह प्रतिफल रहित चेक होता है। आरोपी यह सब कैसे स्थिापित करेगा तो इसका जवाब तो चैंक बाउंस के मामलों में आरोपी की ओर से पैरवी करने वाला विषेशज्ञ अधिवक्ता ही दे सकता हैं क्योंकि प्रत्येक मामले की परिस्थितियाॅ भिन्न भिन्न होती हैं।
न्यायालय में फायनेंस कंपनी की ओर से उपस्थित साक्षी दरअसल पेशेवर गवाह होता हैं, जो कि फायनेंस कंपनी के ज्यादातर मामलों में गवाही देने का काम करता हैं। फायनेंस कंपनी संक्षिप्त परिवाद पत्र पेश करती हैं तथा एैसे दस्तावेज कभी पेश नहीं करती हैं जिससे कि बचाव पक्ष को कोई मौका मिल जाए। ज्यादातर मामलों में होता यही कि फायनेंस कंपनियाॅ के विरूद्ध आरोपी अपना बचाव प्रमाणित नहीं कर पाता हैं। क्योंकि यह कानून दस्तावेज आधारित है।
विधि एवं न्याय का प्रश्न यह हैं कि फायनेंस कंपनी ने वाहन को जप्त कर लिया था, वाहन को निलाम कर दिया था तो क्या अब कंपनी धारा 138 का मुकदमा ला सकती हैं तो इसका जवाब हैं कि फायनेंस कंपनी धारा 138 का मुकदमा नहीं ला सकती हैं क्योंकि विधिमान्य ऋण अथवा दायित्व का कोई अस्तित्व नहीं रह जाता हैं। कंपनी और ग्राहक के मध्य का हायर परर्चेस एग्रीमेंट वाहन जप्त होने एवं निलाम कर दिए जाने से अनुबंध समाप्त हो जाता हैं। प्रश्नगत् चैंक धारा 43 के दायरें में आ जाता हैं और धारा 138 का अपराध गठित नहीं होता हैं।
फायनेंस कंपनियों के मामलों में यह भी देखने में आता हैं कि एक ही ऋण प्रकरण में कंपनी चैंक बाउंस कानून में धारा 138 का मामला चलाकर वसूली करती हैं साथ में मध्यस्था एवं सुलाह अधिनियम 1996 में अवार्ड पारित करवा कर भी वसूली करती हैं। वित्तीय कंपनियों की वसूली के लिए सरफैसी एक्ट 2002 बना हुआ हैं जिसके तहत कंपनियाॅ बकाया धनराषि की वसूली कर सकती हैं।
चैंक बाउंस के मामलों के कारण पीड़ितो की संख्या लगातार बढ़ते ही चली जा रहीं हैं। चैंक बाउंस में बचाव अन्य सिविल या क्रिमिनल मामलों की तरह नहीं लिया जाता हैं बल्कि प्रतिपरीक्षण की एक विषिष्ट शैली होती हैं। आरोपी पक्ष को चाहिए कि वह चैंक बाउंस के मामलों में आरोपी की ओर से पैरवी करने में अभ्यस्थ व अनुभवी अधिवक्ता से सलाह लेनी चाहिए। अक्सर देखने में आता है कि इस मामले में विचारण न्यायालय का झुकाव एकतरफ़ा फायनेंस कंपनी की ओर ही कमोबेश रहता है। जबकि विधि के सिद्धांत के अनुसार चेक का अनादरित होना मात्र ही अपराध नहीं है, उसमें धारा-138 के समस्त घटक विद्यमान होना चाहिए। it is a fiction of Law.
Adv . S. K. Ghosh ,
Raigarh.