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बलखाती नागिन-21 श्रेष्ठ नारीमन की कहानियां पंजाब: Snake Story



भारत कथा माला

उन अनाम वैरागी-मिरासी व भांड नाम से जाने जाने वाले लोक गायकों, घुमक्कड़  साधुओं  और हमारे समाज परिवार के अनेक पुरखों को जिनकी बदौलत ये अनमोल कथाएँ पीढ़ी दर पीढ़ी होती हुई हम तक पहुँची हैं

Snake Story: जब से दीपाली क्वार्टर नंबर तीन में आई है, तब से रेलवे कालोनी में भगदड़ मच गई है। सूखे ढूंठ में से भी कोंपलें फूटने लगी हैं। अंगड़ाइयां लेती, गर्म-ठंडे सांस को महसूस करने के लिए हर कोई बेताब होने लगा है। रूखा-मुरझाया आलम खिल कर बसंत हो गया है। चारों ओर का वातावरण महक उठा। फिजा सुगंधित होने लगी है।

परन्तु….!

क्वार्टर नंबर एक और दो की औरतें परेशान रहने लगी हैं। क्या करें? उन बेचारी औरतों के लिए अपने घर संभालने मुश्किल हो गए हैं।

क्वार्टर एक में स्टेशन सुपरिडेंट अशोक बाबू का परिवार रहता है। तीन पुत्र। बड़ा विवाहित, दो ब्याहने योग्य जवान-जहान और रहने के लिए दो ही कमरे।

क्वार्टर दो में बुकिंग क्लर्क राम दयाल का परिवार रहता है। पति-पत्नी के अलावा शारीरिक-मानसिक रूप से अविकसित एक पुत्र दीपक, बूढ़े मां-बाप और एक क्वारी बहन मगर रहने वाले कमरे, वही दो।

दोनों बाबुओं की समस्या का एक ही समाधान। क्वार्टर नंबर तीन।

छड़ा-छटांग स्टेशन मास्टर बाबू लाल शर्मा रेलवे रिटायरिंग रूम में ही रहता आ रहा था। उसका क्वार्टर दसरे दोनों बाबओं के परिवारों के लिए पनाहगार बना हआ था। दो कमरों में से एक में स्टेशन सपरिटेंडेंट के बडे पत्र-बह और दसरे में टिकट बाब राम दयाल के माता-पिता का गजारा चल रहा था। क्वार्टर का पिछला आंगन दोनों औरतें संयुक्त रूप से फालतू सामान रखने के लिए प्रयोग में ला रही थीं।

अचानक बाबू लाल ने क्वार्टर की चाबी ले कर दर्जा चार मुलाजिमों को साफ-सफाई पर लगा दिया। दूसरे दोनों बाबुओं का ताना-बाना उलझ गया।

कहने को पंजाबी ब्राह्मण। देखने में यू.पी.-बिहार का युवा, बाबू लाल जब कच्ची कोमल-सी स्त्री को ले कर कालोनी पहुंचा तो समस्या गंभीर हो गई।

अशोक बाबू के बड़े लड़के का दाना-पानी यहां से खत्म हो गया परन्तु बड़े से छोटा विक्की आने-बहाने क्वार्टर नंबर तीन के आसपास चक्कर काटते हुए शुतरमुर्ग-सी गर्दन उठा कर इधर-उधर ताकने लगा।

वास्तव में क्वार्टर नंबर तीन के क्रमांक अनुसार, अंतिम होने के बावजूद कालोनी में दाखिल होते ही सब से पहले बना हुआ है। इसलिए अगले दोनों क्वार्टरों के लिए यहीं से निकलना पड़ता था। तीनों अधिकारियों के क्वार्टरों से जरा पीछे हट कर चार दर्जा मुलाजिमों/मातहतों के कितने ही क्वार्टर हैं। इन मातहतों के बच्चे बाबुओं की औरतों को प्रसन्न करने की गरज से उनके छोटे-मोटे कामों में हाथ बंटाने के इरादे से दोनों क्वार्टरों में चक्कर लगाते ही रहते थे। अब वे सीधा ही नंबर तीन की ओर पहुंच जाते। दोनों औरतें भले कितनी ही आवाजें देती रहें। मजाल है, उनके कानों पर जूं भी रेंगती हो। वे काम करवाने के लिए मुंह उठा कर ताकती रहती। बच्चे उस चक्र के गिर्द ही घूमते रहते। वे इंतजार करते, कब बाबू लाल क्वार्टर से निकले और कब उन्हें रबड़ की गुड़िया-सी दीपाली के साथ खेलने का मौका मिले।

काला रंग, ना दाढ़ी, ना मूंछ, पांच फुटा, तोंद निकाले बाबू लाल जब बोलता तो लगता जैसे गौरेया कं-कू कर रही हो। क्या वह सच में ब्राह्मण था? उसकी नस्ल जांच की चर्चा छिड़ी ही रहती। अब जब से इस ‘पटोले’ को ब्याह कर लाया था, चर्चा का विषय था, ‘हाथी को हिरणी कैसे मिल गई?’

परन्तु….!

इस सबसे यदि किसी को कुछ लेना-देना नहीं था, तो वे थे इस कालोनी के बच्चे। जिन्हें अपने साथ हंसने-खेलने और मनपसंद चीजे खिलाने वाली शाहणी बाबू की पत्नी दीपाली का साथ मिल गया था।

इधर साए बड़े होने लगते, उधर मांओं की आवाजें आसमान फाड़ने लगती, मगर बच्चे तो बच्चे हैं।

***

शाम के चार बजने में दस मिनट बाकी हैं। स्टेशन मास्टर बाबू लाल की ड्यूटी चार बजे शुरू होने वाली है। सफेद वर्दी और काला कोट पहन, बगल में टोपी दबा कर, वह कालोनी की पतली पगडंडी पर मस्त हाथी की चाल से चलते हुए रेलवे स्टेशन की राह चल दिया।

“आ जाओ भई…बर्फ से कौंवा उड़ गया।” बच्चों की आवाजें चहचहाने लगीं और कालोनी में पहाड़ी राग गूंजने लगा।

बच्चों के आगमन की प्रतीक्षा करते स्टेशन मास्टर की धर्मपत्नी दीपाली की पाजेबों की झनकार क्वार्टर के पिछले दरवाजे से बाहर निकल लॉन तक पहुंचने लगी।

बच्चों में बच्चा बन जाने वाली दीपाली लॉन में पहुंची। सोनू और निक्की रस्सी घुमा रहे थे। गौरी और नीलू रस्सी कूद रही थी। सोनू और निक्की ने आंखों में ही बात की और रस्सी की रफ्तार बढ़ा दी। फिर रस्सी धीमी करके ढ़ीली छोड़ दी। अचानक रस्सी की रफ्तार से गौरी और नीलू के पैर उखड़ गए। उनके आऊट होते ही गौरी और नीलू ने रस्सी के सिरे संभाल लिए। फांदते हुए सोनू और निक्की रस्सी टापने लगीं। अभी वे गति में आने ही लगी थी कि दो-चार टप्पों में ही उनकी जोड़ी आऊट हो गई।

अब अपनी बारी की प्रतीक्षा कर रही कालोनी की सब से तगड़ी माने जाने वाली दीपाली और दीपक की जोड़ी रस्सी कूदने आ पहुंची। सभी की नजरें उनके फांदने के साथ कदम-ताल मिलाने लगी।

दीपाली को क्वार्टर में आए अभी कुछ ही महीने हुए हैं। बच्चों के साथ छोटी-छोटी बातें करते, वह उनकी टोली का ऐसा हिस्सा बन गई कि बाबू लाल के क्वार्टर से बाहर निकलते ही कालोनी के सभी बच्चे उसके इर्द-गिर्द आ जुटते। वह बच्चों के लिए उनकी मनपसंद चीजे बनाती। अपने हाथों से खिलाती, फिर उनके साथ खेलते हुए बच्ची ही बन जाती। सभी बच्चे उससे लाड लडाते और वह उनसे। मगर रस्सी कूदते समय उसकी जोड़ी हमेशा बाबू राम दयाल के अविकसित बेटे दीपक के साथ ही बनती। रस्सी घुमाने वालों के हाथ थक जाते परन्तु उनकी जोड़ी ना थकती, ना हांफती। सूरज छिपने की तैयारी करने लगता, तब मुश्किल से इस खेल को रोकना पड़ता।

“औल तेज, औल तेज धुमाओ।” तुतला कर बोलता दीपक, दीपाली की अंगुलियों में अंगुलियां फंसाए अपने कद से दुगुना उछलते हुए रबड़ की गेंद बन जाता। उनका खेल देखते अन्य बच्चे तालियों से उनका हौसला बढ़ाते।

चूड़ीदार के साथ झालर लगी कुरती में दीपाली चकरी-सी घूमती दिखती। हवा में उसके उडते बालों ने दीपक पर छाता-सा तान दिया। हर कोई अपनी बारी के इंतजार में छटपटाने लगा।

“हमारी बारी कब आएगी?” सवालिया निशान से माथे पर त्यौरियां लिए सोनम और राजा बिना पलक झपके उनके टप्पे गिनते हुए थक गए। ढलते साए देख, अपनी बारी को ठंडे बस्ते में जाता देखने लगे। वे तालियां मारना छोड़ कर एक ओर जा बैठे।

ढलता सूरज क्वार्टर के लॉन के कोने में लगी बेरी के पत्तों से जड की ओर आने लगा। उसने हर बार की तरह आखिर से पहली गाड़ी के आने का इशारा भी दे दिया। प्रीतम लाल झंडी ले कर आऊटर की ओर साइकिल के पैडल मारते हुए जा रहा है। थोड़ी ही देर में मुसाफिरों को हमसफर बनाती रेलगाडी अगले स्टेशन के लिए रवाना हो जाएगी। बच्चों के खेल को विराम लग जाएगा और दीपाली अगला खेल खेलने लग जाएगी।

“दीप…ओ दीप….। दीपा…ओ दीप…। आजा भई, बस कर अब। तेरी आंटी थक जाएगी। आ जा मेरा दीपू। मम्मी ने चाय के साथ पकौड़े बनाए हैं।”

टिकट बाबू राम दयाल लॉन के बाहर खड़ा पुकार रहा है। पिछले पन्द्रह-बीस मिनटों से गेट से लिपटे उछलती-कूदती रबड की दो गेंदों को ऊपर-नीचे होते देख वह ‘काम दयाल’ बन जड़ हो गया। उसकी हांक को अनसुना कर दीपक अपनी ही किलकारियों में मस्त था। वह दीपाली का हाथ थामे रस्सी कूदने में खोया हुआ है।

एक-दो आवाजें लगा कर राम दयाल वहीं गेट पर ठोडी टिकाए, आंखें सेंकते हुए, छनकते पलों का रस भोगने लगा।

“चाय एकदम ठंडी हो गई है। बच्चे को बुलाने गए तुम खुद भी खेलने लगे। आंखें क्या नचा रहे हो। जाओ, जा कर खुद भी रस्सी कूद लो। बच्चों के बहाने ठरकी अपना मजा…।” राम दयाल की पत्नी नारायणी के बोल बंब समान उसके सिर में लगे और वह उल्टे पांव पत्नी की ओर घूम गया।

“अपना गेंडू संभाला नहीं जाता, हमें उल्लू बना कर पीछे लगाए फिरती है।” राम दयाल की पत्नी बुदबुदाती दीपाली को सुनाते हुए अपने क्वार्टर में जा घुसी। राम दयाल भी भुनभुनाते हुए उसके पीछे चल दिया।

“रोको…। नीलू, गौरी…बस…। हाय रोक दो रस्सी। मेरी कमर में बल पड़ गया है।” दीपाली की आवाज सुन कर रस्सी की गति को थाम दिया गया। रस्सी रुकते ही दीपक एक ओर जा खड़ा हुआ।

“क्या हुआ मेरी लाडी को?’ दीपाली ने उसका गाल सहलाते हुए हल्के से चूम लिया।

“तेले कमर के बल ने हामें हला दिया।” उसने रुठते हुए माथे पर त्यौरी चढ़ा ली।

“हम कल, इससे भी डबल रस्सी कूदेंगे। मेरे दीपक की पसंद का हलवा भी बनाएंगे।” दीपाली ने उसकी दूसरी गाल को भी चूम लिया।

“अले…! आहा…।” दीपक ने उछल कर अपनी बांहें उसके गले में डाल दी और उसके माथे पर पप्पी दे दी।

दीपाली ने दीपक को पकड़ कर जोर से घुमाया और उसे गोद में लिए ही पास पड़ी कुर्सी पर बैठ गई।

दीपाली की गोद में बैठा दीपक अन्य बच्चों को टॉफियां देते हुए वह उससे छोटी-छोटी बातें करने लगा, “आंटी, मेली मम्मी आथदी है वो मेले लिए दीपाली आती जैसी बहु लावांगे। फिल वो मेले साथ लस्सी तापा तरेगी।”

“अच्छा! और फिर मेरे साथ कौन रस्सी कूदेगा?’ दीपाली ने लाड किया।

“मैं ही तपा तलूंगा। बहू तो दौली के साथ लस्सी धुमाया करेंगी।”

“आया बड़ा दीपाली आंटी जैसी बहू लेने वाला। पहले नाड़ा बांधना तो सीख ले। ये देखो आंटी, यह अभी तक एलास्टिक वाला पजामा पहनता है। इस की दाड़ी-मूंछ भी रोज इसका डैडी बनाता है। ना ऐसा करे तो यह बाबा लगे, बूढ़ा।” अपनी बारी ना आने की खीझ सोनम ने इस तरह से निकाली।

“तुम जलती हो। मुझे सुन्दर बहू मिते तो।”

उस की भोली बात सुन कर दीपाली खिलखिला दी। अपनी गाल को दीपक से रगड़ते हुए, उसने फिर से उसकी पप्पी ले ली। दीपक ने भी गाल रगड़ते हुए सोनम को अगूठा दिखाते हुए चिढ़ाया। दीपाली के साथ हंसते-खेलते हुए बच्चे एक-एक कर के विदा होने लगे। पल-क्षण में ही लॉन की रौनक उदासी में बदल गई।

दीपाली ने पिछले दरवाजे को ताला लगाया। बाबू लाल की पसंद में ढलने के लिए अलमारी खोली। महरून रंग की साड़ी निकाली। चूड़ीदार और कुरती उतार कर अलमारी के निचले तले में रख दिए। पेटीकोट और ब्लाऊज पहन लिया। साड़ी लपेटते हुए, कंधे पर सीधा पल्ला डाल, सिर पर पल्लू कर लिया। मांग में सिंदूर भर कर बड़ी बिंदी सजाई। नैनों में काजल लगा, बिस्तर लगाने लगी। गुलाब के फूलों वाली चादर बिछा कर, तकिए की ओर साफ तौलिया रख दिया। कमरे में इत्र का छिड़काव किया। दरवाजा बंद किया और रसोई में बाब लाल की पसंद की दाल में तडका लगा कर. अंडों की भर्जी के लिए प्याज भनने लगी। प्लेट से अंडा उठा कर चम्मच से टकोर कर कड़ाही में तोडा। अरे यह क्या?

अंडा खाली था। एक-एक करके कई अंडे देखे, सभी खाली। इधर प्याज कडाही में भरे से काला होने लगा। बाब लाल को भर्जी ना मिलने से पड़ने वाले क्लेश से वह घबराने लगी।

वह जब से इस क्वार्टर में आई थी, उसने रसोई का दरवाजा कभी खुला नहीं छोड़ा था। फिर किसने इस तरह अंडों को खाली कर दिया था।

पहले-पहल तो अंडा-मीट के बारे में सोच कर उसे उबकाई आती। बाबू लाल का ब्राह्मण कुल का हो कर भी मीट-शराब का आदी होना। एक समय मीट-अंडा ना मिले तो स्यापा।

“एक-एक अंगुली में कई तरह के नग जड़ी अंगूठियां डाल, गले में माला डाल कर पता नहीं कौन-सी भक्ति करता है? शक्ल मेमनों-सी और काम कसाईयों से। राक्षस पल्ले पड़ गया।” मन खीझता रहता। फिर भी धीरे-धीरे उसने पति परमेश्वर को रिझाने के लिए पेट के रास्ते उसके दिल में उतरने का रास्ता बना लिया।

लाख उपाय किए। समझ में ना आता। कितनी बार दुकानदार पर शक गया। अंडे खाली तो नहीं भेज सकता। उलाहना दिया। फिर सामान लाते हुए अंडे चेक करने लगी। एक-दो तोड़ कर देखती। सही होने की तसल्ली करती परन्तु शाम ढलने पर जब भुजी बनाने के लिए अंडे तोड़ती तो खाली खोल के कुछ पल्ले ना पड़ता।

अंडों के खाली खोल से दिमाग को फैंटते हुए, वह रसोई से निकल कर क्वार्टर के आंगन में पड़ी कुर्सी पर आ बैठी।

डोर बेल हुई। दरवाजे की जाली से कोई झांका। सफाई सेवक प्रेमनाथ था।

“बीबी जी, मालगाडी आ गई है, बाबू जी लेट आएंगे।” वह संदेश दे कर चला गया। जाली वाले दरवाजे से सिर टिका कर दीपाली स्टेशन की ओर देखने लगी।

“दीपाली, तुमने आज क्या पकाया है?” जाली से लगे कान में अचानक आवाज सुन कर वह चौंक गई। देखा, बाबू अशोक की पत्नी पास खड़ी थी।

“दाल। आओ, अंदर आ जाओ।” कहते हुए दीपाली ने जाली वाला दरवाजा खोल दिया।

“यह विक्की मेरी जान खा जाता है। पता नहीं कैसे तुम्हारे लगाए तड़के की खुशबू उसे मिल जाती है। मुझे कहने लगा, दीपाली भाभी ने दाल को तड़का लगाया। तुम्हारी दाल की खुशबू ने मेरे मुर्गे का स्वाद फीका कर दिया। यह कटोरी ले लो। तम विक्की को दे देना. वह क्वार्टर में है। मैं मंदिर से आ रही हूं।” कह कर वह पलटने लगी।

“रुकिए आंटी। दाल ले जाएं।” कह कर दीपाली जल्दी से कटोरी भर लाई। कटोरी आंटी को थमा कर दरवाजा बंद करने लगी तो सामने सड़क पर खड़ा विक्की मुस्कुरा रहा था।

दीपाली ने उसे घूर कर देखा। वह अंगड़ाई लेते हुए अपने क्वार्टर की ओर चल दिया।

दीपाली ने जाली के दरवाजे की चिटकनी लगा, दूसरे दरवाजे पर ताला लगा दिया। खुद आंगन में पड़ी कुर्सी पर बैठ, अंडों के खाली खोल से दिमाग का पंजा लड़ाने लगी।

अचानक पिछले दरवाजे की दरार से घुसते हुए सांप आंगन में आ कर फुकारने लगा। डर से दीपाली ने पैर कुर्सी पर समेट कर, बांहें कस लीं। अगले ही पल नाली से निकले मोटे-तगड़े नेवला ने एक ही झटके में सांप की गर्दन को दबोच लिया। सांप खुद को छुड़ाने के लिए छटपटाने लगा। ढ़ाई-तीन फुट लंबे सांप ने बहुत जोर लगाया, कुंडली खोल कर, फन उठा कर फुकारता परन्तु आधे फुट का नेवला उछल कर फिर से उसका फन दबोच लेता। सांप बच कर अपने साथी के पास पहुंचेगा या नेवला उसे निगल लेगा। इस गुत्थम-गुत्था को देखते हुए दीपाली के सिर पर नाग-नागिन का खेल सवार हो गया।

विवाह की पहली रात…।

अरमानों की सेज पर, नागिन बलखाने लगी।

सुहाग सेज! खुमारी बन कर नैनों में उतर आई। सांस किसी की सांसों में घुलने के लिए फड़फड़ाने लगे।

वह अभी सुहाग सुगंध का आनंद लेती कि पिछले दरवाजे के ऊपर बिल्ली ने छलांग लगाई। दीपाली की चीख निकल गई और वह सुहाग-सेज से उछल कर कुर्सी से नीचे लुढ़क गई। अचानक शोर उठने से नेवला नाली की ओर बाहर भाग गया। नेवले के जबड़े से छूटा जख्मी सांप रेंगते हुए दरवाजे की दरार के नीचे से बाहर निकल गया।

उसका ध्यान स्टेशन की ओर गया। इंजन की चीखें उसके दिल को कंपाने लगी। बाबू लाल का इंतजार हड्डियों में कसकने लगा। मालगाड़ी की तेज होती आवाज से उसे गाड़ी के जाने का संदेश मिल गया। दीपाली सिर से पैरों तक सुरताल में रमी, हसीन पंखों पर सवार, अगले दरवाजे की ओर भागी। कमरे से बाहर की ओर खलते जाली के दरवाजे से उसने आंखें जोड़ लीं।

घुप्प अंधेरे में सरसराहट की आवाज आई। पगडंडी पर चले आते बाबू लाल पर क्वार्टरों की स्ट्रीट लाईट की रोशनी पड़ी। उसकी धड़कनें बेकाबू होने लगी। सूखे होंठों पर जीभ फिराई। साड़ी का पल्लू संवारा। बालों की लटों पर हाथ फिराया। चिटकनी खोल कर, बेकाबू होकर, वह बाबू लाल के निकट जा पहुंची।

बिना किसी प्रतिक्रिया के बाबू लाल आगे चलते हुए दरवाजे के अंदर चला गया। उसकी पीठ की ओर देखते हुए दीपाली भी अंदर आ गई। दोनों दरवाजे बंद कर, ताला लगा कर, उसने पानी का गिलास बाबू लाल को थमाया और रसोई से खाने की थाली उठा लाई।

“कितनी बार तुम से कहा है, मेरी राह मत ताका करो। रोटी खा कर सो जाया करो। मुझे पसंद नहीं, कोई मेरे लिए कुछ विशेष करे। सारे दिन का थका-हारा आदमी। घर आकर भी ना चैन नसीब होता है ना ही आराम।” बोलते हुए वह बेड की ओर बढ़ा।

“और खाना…।’ दीपाली ने दबी आवाज में पूछा।

“स्टेशन पर मीट बनाया था। खा लिया खाना। तुम्हारा यह घास-फूस..। दिखा क्या बनाया है दाल? ले मुंह खोल, और पी ले इसे।” उसने कटोरी दीपाली के मुंह से लगा दी।

ख्वाहिशों के पर्वत से झर-झर बहते आंसुओं में वह एक ही चूंट में दाल गटक गई। थाली रसोई में रख कर, पति के पास आ कर लेट गई।

मुंह पर चादर डाल, करवट लिए बाबू लाल गुच्छा बना सो रहा था। वह कितनी देर चादर में लिपटी पति की स्थिर देह को निहारती रही।

“शव!” वह बुदबुदाई।

प्रेम-क्रीड़ा में लीन नाग-नागिन को कल्पना में देखते हुए, उसके भीतर नागिन ने फन उठाया। वह हिम्मत करके चादर की फूल-पत्तियों को सहलाते हुए पति की पीठ सहलाने लगी। सरकते हुए पति की पीठ से जा लगी। पति के सीने की ओर कलाई घुमा कर, उसके सीने के बालों को सहलाने लगी। सफाचट छाती। उसे थोड़ा अजीब-सा लगा। मगर उसका हाथ ना रुका। अपनी ओर करने के लिए उसने पति का कंधा हिलाया मगर कोई हिलजुल नहीं।

तकिए के नीचे रखा तौलिया एक हाथ से बाहर निकाला। वह बाबू लाल के सीने से चिपट गई। सांस तेज होने लगी। अंगुलियां अभी भी पति के बालों को सहला रही थी।

विवाह का तीसरा महीना बीतने लगा मगर तौलिया अभी भी नया और साफ।

बाबू लाल पता नहीं किस मिट्टी का बना था। हर रात कमरे के अंदर घनघोर घटाएं आतीं। छम-छम बरसने के लिए मिन्नत करती परन्तु ना बादल आपस में टकराते, ना ही बंदा-बांदी होती।

बाबू लाल पानी के एक ही चूंट से दवा निगलता और खुर्राटे मारने लगता। थक-हार कर दीपाली भी सो जाती। हसीन ख्वाबों को दिल की संदूक में संभाल कर, वह फिर सुबह से नई रात का इंतजार करने लगती।

जब से वह बाबू लाल के पल्लू से बंधी थी, आज पहली बार बाबू लाल के खुर्राटे ही नहीं रात भी शांत थी।

केवल बेचैन थी तो दीपाली की बेलगाम हसरतें। उसकी अंगुलियां अभी पति के बालों का कुंडल बनाती, शरीर पर फिरने लगी थीं। सांसे तेज हो, किनारे पर रगड़ खाकर, ऊंची उठने लगी। हाथ की रफ्तार अगला सफर तय करने लगी।

अचानक बाबू लाल घुटने के बल उठ बैठा। उसने दीपाली की अंगुलियां मरोड़ कर उसे बिस्तर पर गिरा दिया। दीपाली की ख्वाहिशें फिर सजने लगीं। उमंगों के सागर में आंखें बंद कर, वह लहरों संग खरमस्ती करने के लिए, उसने शरीर की किश्ती को आजाद छोड़ दिया।

“बड़ी आग है तेरे अंदर।” बाबू लाल कड़क उठा और दीपाली को कोंचने लगा। चेहरा, छाती! अंग-अंग कचोट डाला। नेवले के जबड़े से खुद को छुड़ाने के लिए दीपाली छटपटाने लगी। वह यत्न कर, सिर उठाती। बाबू लाल ने उसे बालों से पकड़ उसे नोच डाला। हाथ में पकड़ा तौलिया दर्द सहन करने के लिए दांतों तले दबा लिया। दोनों हाथ जोड़ कर, छोड़ देने का वास्ता दिया। आगे से कभी उससे कोई उम्मीद ना करने की दुहाई दी परन्तु भूतरा सांड बाबू लाल उसकी बोटी-बोटी नोंचने पर आमदा लगा।

दीपाली की आंखों के सामने छलांग लगाती बिल्ली घूम गई। उसने जोर लगा कर लटकते पर्दे को खींच दिया। पाईप समेत पर्दा बाबू लाल के सिर पर आ गिरा। दर्द से बिलबिलाते हुए बाबू लाल ने दीपाली को परे धक्का दिया। सिर को हाथों से दबाते हुए, बेड पर हांफते हुए खुर्राटे मारने लगा।

एक-एक कसक पर आंसू भरे तौलिए से सेंक करते हुए दीपाली पहली रात से सिसकियां समेटने लगी। तन और मन का दर्द हिचकियां लेने लगा। फलों का सेज शलों का बिछौना बन गई। अपनी किस्मत को कोसते हए. वह उस घडी को कोसने लगी. जब उसका भाग्य बाबू लाल से जुड़े थे।

***

बारहवीं क्लास की प्रतीक्षा करती दीपाली आगे की पढ़ाई की तरकीब सोच रही थी। मां-बाप उसके विवाह से भार-मुक्त होने की योजनाएं बनाने लगे।

“क्या हुआ? बाबू लाल उससे उम्र से दुगुना बड़ा नहीं, बस थोड़ा ही बड़ा है। देखने में सुन्दर नहीं। आदमी की सुन्दरता से क्या लेना-देना। इस लिहाज से स्टेशन बाबू की खूबसूरती का पैमाना लबालब भरा हुआ है। सारी उम्र तो भूखी नहीं मरेगी, राज करेगी अपनी दीपाली। सरकारी नौकरी। इकलौता पुत्र। ना कोई भाई-बहन, ना जमीन-जायदाद के बंटवारे का झंझट।” मां के शब्द दिल में दोहराते हुए सुनहरे सपना-संसार के पंखों पर सवार हुई दीपाली सुहाग-सेज पर बैठी पति की प्रतीक्षा कर रही थी।

रात आधी से अधिक बीत चुकी थी। बाबू लाल कमरे में दाखिल हुआ। फूलों से सजी सेज पर बैठी दीपाली सिमट कर छुई-मुई सी हो गई। पति के मीठे स्वर की बजाय उसे गटगट की आवाज सुनाई दी। पानी की चूंट ने उसका अंदर निचोड़ डाला। चूंघट से नजरें उठा कर देखा। बाबू लाल ने दवा का पत्ता खोला। पानी के गिलास से दवा गटक, बेड पर लेट गया। पति के मुहब्बत भरे स्वर की बजाय खुर्राटों की आवाज सुन, फूलों की सेज पर बैठी दीपाली के अरमान कुचले गए।

क्या हुआ होगा? थकावट…। बुखार!

कुछ भी हो? आदमी कितना भी थका क्यों ना हो? कोई अपनी सुहागरात पर अपने सपनों की शहजादी के साथ दो बोल साझे किए बिना कैसे सो सकता है? पहली रात तो नई जिन्दगी का आगाज होती है। यह कैसी शुरूआत थी? विचारों से घुलते दीपाली बेड से टेक लगाए पता नहीं कब सो गई?

आंख खुली। कमरे में बिना लाईट ही इतनी रोशनी देख, उसे पता लगा कि काफी दिन चढ़ आया है। बाबू लाल बेड पर नहीं था। आस-पास देखा। कहीं नजर ना आया। जल्दी से कपड़े बदल कर सास के पास गई। पता लगा, बाबू लाल की छटी खत्म हो गई है। थोडी देर में वह नौकरी वाले स्टेशन के लिए रवाना होने वाला था।

वह बिना कुछ बात कहे ही चला गया। पति की पीठ निहारते दीपाली घर की दहलीज पर ही खड़ी रह गई। नौकरी में शायद ऐसा ही होता होगा। सारी जिन्दगी पडी है। पति उसका और वह पति की। अगले हफ्ते वह फिर वापस आएगा ही। जहां पति वहां वह। ‘दीपाली तेरी डोली अगले हफ्ते विदा होएगी। सुहाग रात विदाई से पहले कैसे होगी? सोच कर वह शर्मा गई। सास के आगे-पीछे डोलती, वह घर में दिल लगाने लगी।

एक हफ्ता क्या, अब तो तीन हफ्ते निकल गए। सब कुछ बहुत ही अजीब।

बाबू लाल का फोन आता। मां-बाप से बात करता। फोन बंद हो जाता। यह कैसा रिश्ता है? परेशानी बढ़ने लगी।

विवाह हुए एक महीना हो गया। पति से दो जिस्म और एक जान होना तो दूर की बात, बात भी नहीं हुई थी।

सास के पांव चरण स्पर्श करने पर, वह ‘दुधो नहाओ, पूतो फलो’ का आशीर्वाद देती। सिर सहला कर इस प्रकार झांकती जैसे रेडीमेड बच्चा पैदा करके कहेगी, “लो मां जी। तोहफा कबूल करो।” सास की असीस उसे जहर लगने लगती।

फिर एक दिन! जैसे ही सास ने सिर पर हाथ फिराते हुए असीस को दुहराया, पता नहीं कैसे उसके मुंह से निकला, “मां जी जमीन से भी मशरूम तभी फूटती है, जब मेघ बरसता है। सूखी धरती से मैं कौन-सा मंत्र फूक कर पोते निकाल कर आपकी गोद में रख दूंगी। फिर यह द्वापर युग तो है नहीं, आंखें बंद कर देवता का ध्यान करने से सूर्य पुत्र हाजिर हो जाएगा।”

अक्सर चुप रहने वाली दीपाली की बात सुन कर, सास शर्मिन्दा-सी हो गई। सास ने बहू की वेदना ससुर के कान में डाली। मुद्दे पर तुरन्त एक्शन लेते हुए बाबू लाल को फोन करके बुलाया गया और दीपाली को जल्दी ही गोद हरी होने का आशीर्वाद दे कर पति संग गाड़ी में बिठा दिया गया।

पति के साथ सटी बैठी दीपाली खुश थी परन्तु बाबू लाल मुंह सुजा कर बैठा था। दीपाली अचरज में थी।

खैर! कुछ भी हो! ब्याहता होने का एहसास तो हुआ। ख्यालों के सागर में खोते हुए वह खिड़की से लग कर बाहर देखते हुए, उसने बाबू लाल के हाथ पर हाथ रख दिया।

पहला स्पर्श! उसके भीतर झनझनाहट होने लगी। बाबू लाल ने उसका हाथ झटक दिया। वह कांप गई। नैनों से सागर छलकने लगा।

“सॉरी दीप।” पहली बार पति के मुंह से अपना नाम सुना। वह भी दीपाली की जगह दीप। सुन कर, उसका भीतर जगमग-जगमग कर उठा। चेहरा सर्ख। दिल चाहा. बाब लाल उसे बांहों में भर ले और वह उसके अंदर समा जाए। सोचों की तश्तरी रंगीन सपनों में खो गई।

छोटा-सा रेलवे क्वार्टर। जहां मैं और बस मेरा स्टेशन बाबू।

एक-एक सुख महसूस करते हुए उसका हाथ कोख पर आ टिका। अंदर कुछ हिला। वह सारी की सारी ममतामयी हो गई। उसके होंठों पर मुस्कान फैल गई। गाड़ी ने चीख मारी। वह चौंक कर सीधी बैठ गई।

गाडी की गति धीमी हुई और प्लेटफार्म पर आ कर रुक गई। बाबू लाल की पीठ निहारते हुए दीपाली ने प्लेटफार्म पर पैर रखा। उसने अपनी जन्नत की पगडंडी पर उडान भरी। क्वार्टर नंबर तीन के गेट पर पहुंच कर दिल तालियां बजाने लगा।

गेट के बाएं हाथ बेरी के नीचे नाग और नागिन। वह डर कर सिमट गई।

“पीछे खाली स्थान पर जंगल और झाड़ियां आदि हैं। खूखार कुत्ते, सांप, नेवले, चूहे, बिल्लियां, छिपकलियां, इस कालोनी में आम घूमते हैं। डरने की बजाय एहतियात की आवश्यकता है। जाली वाले दरवाजे की चिटकनी चढ़ा कर, लकड़ी के दरवाजे को हमेशा ताला लगा कर रखना।” दीपाली को क्वार्टर में पहुंचा कर बाबू लाल ने उसे नसीहत की और खुद स्टेशन चला गया।

जाली के दरवाजे की चिटकनी लगाते हुए नजर नाग-नागिन की ओर घूम गई। दोनों एक-दूसरे में कुंडली लगाए मस्त पड़े थे। फिर उसकी नजर बेरी की टहनी पर बैठे तोता-मैना के खेल पर गई। कुदरत के रंगों का कोई संकेत समझ, दीपाली के चेहरे पर लाली बन उभर आया। अजब खुमारी के नशे में उसने लकड़ी का दरवाजा बंद किया और बाहर को भूल कर, भीतर को संभालने लगी।

छोटा-सा क्वार्टर। जाली का दरवाजा, बाहर के गेट की ओर लकड़ी का दरवाजा अंदर ड्राईंग रूम में खुलता था। उसके पीछे बेडरूम के साथ एक स्टोर। पीछे आंगन। आंगन में रसोई और साथ ही पीछे के आंगन का दरवाजा। उसके पीछे गुसलखाना। दीपाली ने आते ही अपने घर की मालकिन होने का चोला धारण किया और सब से पहले रसोई का जायजा लिया। आवश्यकता की हर चीज मौजूद थी।

अगले दरवाजे की घंटी बजी। लकड़ी के दरवाजे से बाहर देखने के लिए बने छेद से झांका। सफाई सेवक प्रेम नाथ, हाथ में सामान लिए खड़ा दिखाई दिया। दीपाली ने दरवाजा खोल दिया।

“बीबी जी, नमस्ते! बाबू जी ने दूध, अंडे और अन्य सामान भेजा है। कुछ और जरूरत हो तो बता दें। मैं दौड़ कर ले आऊंगा।”

“नहीं, जब जरूरत होगी, मंगवा लूंगी।” उससे सामान लेकर दरवाजा बंद कर दिया और क्वार्टर को घर बनाने के काम में जट गई।

उसके ब्याह को भले दूसरा महीना शुरू हो गया था परन्तु आज पहला दिन था, जब वह घरवाली बनी थी।

घर और घरवाला…।

पहले दिन से सोच पहली रात तक जा पहुंची। वह शरमा गई। बाबू लाल के मुंह से ‘दीप’ नाम सुन तन-मन फुदकने लगा था।

सास-ससुर से एक बात का अवश्य पता लग गया था कि बाबू लाल की ड्यूटी शाम को चार बजे शुरू होकर सुबह दस बजे तक होती है। भले ड्यूटी सारी रात की थी परन्तु रात को सवारी गाड़ियों का आवागमन ना होने के कारण, यदि कोई स्पेशल मालगाड़ी ना हो तो वह आखिरी गाड़ी को भेज कर फुरसत पा जाता था। फिर तड़के क्रॉस की गाड़ियों को निकाल कर दस बजे से शाम तक फुरसत ही फुरसत रहती।

सुहाग की सेज पर रात जो गुजरी सो गुजरी। क्वार्टर की पहली रात को जिन्दगी की खूबसूरत याद बनाने के लिए वह कमरा सजाने लगी।

क्वार्टर के पीछे दरवाजे की ओर देखा। बगीची में भात-भांत के फूल खिले थे। ऊंचे कैक्टस के पौधे पर खिले सुर्ख फूल को देखते हुए उसे उन पर तरस आया। सोचने लगी, “वाह रे कैक्टस। तेरी खोटी किस्मत! रंग गुलाब का लिया मगर तुम गुलाब नहीं जो मुहब्बत का इजहार बने।” उसने गुलाब के फूलों का गुलदस्ता बेड के कोने में सजा दिया। गुलाब के फूलों की चादर बिछाई। तकिए के नीचे तौलिया रखा। फिर कमरे में इत्र छिड़का। भोजन बनाया और सज-संवर कर बाबू लाल की राह ताकने लगी।

आखिरी गाड़ी चीखें मारते हुए गुजरी। दीपाली का दिल पेंडुलम-सा डोलने लगा। बेकाबू हुए दिल की लगाम कसते हुए उसने दरवाजा खोला। बाबू लाल अंदर आया। चुपचाप कपड़े बदले। खाना खाया। पानी के दो बड़े चूंट से दवा गटकी। गले में डाली माला उतारी। अंगुलियों से माला फिराते हुए, आंखें बंद करके बेड से टेक लगा ली। मिनट-सेकंडों में खर्राटे मारते हुए नींद में ऊंघने लगा।

“हैं! ऐसे कैसे? बिना कोई बात किए वह सो गया। गुलाब के फूलों तले छिपी शूल दीपाली के दिल में चुभ गई। फिर सोचा, सफर और काम की थकावट हो गई होगी। दिल और दिमाग को गांठ लगा कर सो गई।

अगले दिन भी इसी तरह ही…। दिन से रात हो गई, जुबान का ताला खलने में ही नहीं आ रहा था।

शाम को पौने चार बजे तैयार होकर ड्यूटी पर जाते समय बाबू लाल ने कहा, “दीप दरवाजा बंद करके रखना। प्रेम नाथ सामान लेकर आएगा। कुछ खास मंगवाना हो तो मंगवा लेना। पैसे अलमारी में रखे हैं।”

कह कर वह कालोनी की पगडंडी पार करके प्लेटफार्म की ओर बढ़ गया। दीपाली के अंदर एकत्रित हई चीखें कराहटें बन गईं। वह बंद दरवाजे से टेक लगा कर कितनी देर तक रोती रही।

पैसे! पैसे! पैसे! नहीं चाहिए मुझे पैसे। बड़ा हनुमान भक्त! मीट-शराब को रगड़ते हुए की भक्ति किस कुएं में जाती है?” छाती पर मुक्के मारते हुए। रोते हुए मन बेकाबू हो जाता।

ध्यान पीछे की ओर चला गया।

बाल ब्रह्मचारी पुजारी दीना नाथ, यादों के रथ पर सवार पर होकर जान को कोंचने लगा।

“बचपन से देखते आ रही हूं। हर मंगलवार को चौंकी लगाता है। कलयुग में ब्रह्मचारी धर्म के साथ गृहस्थी जीवन निभाते हुए वह हनुमान भक्त दर आई संगत को बेटी-बेटे की दात बांटता। अपना आंगन बच्चों से भरा रहता। पुजारन हर समय बिंदी-सुर्सी लगा कर रखती। स्टेशन बाबू तो फिर मीट-शराब खाता-पीता है। यदि मेनका विश्वामित्र की समाधि भंग कर सकती है तो मैं इस योग्य भी नहीं कि पति का सुख पा सकू?” रो-धोकर, उसका मन टिक गया। वह हिम्मत कर उठी। घर समेट कर, एक बार फिर पहली रात के लिए सेज सजाने में लग गई। प्रेम नाथ को बुला भेजा। बाबू लाल की पूजा वाली अलमारी में रखी सिंदूरी हनुमान की फोटो के साथ शिवलिंग और पार्वती की तस्वीर रखकर अगरबत्ती जला दी।

लॉन की बगीची में कमरा सजाने के लिए पीछे आंगन के दरवाजे की ओर गई। दरवाजे की दरार से लगी आंख को देख कर डर गई। दरवाजा खोल कर देखा। सात-आठ साल का बच्चा उसे देखते ही भागने लगा।

दीपाली ने झपट कर उसे पीछे कमर से पकड़ लिया।

“छद दो आंती, छद दो।” थोड़ा हकलाते हुए बच्चा छूटने की जिद करने लगा। दीपाली ने उसे और भी कस लिया।

“पहले बता, क्या कर रहा था ?”

“तुद नीं, तोहणी बहू देखण आया ता।”

सुन कर दीपाली हंस दी। “तब जाने दूंगी, पहले मेरे साथ फूल तुड़वाएगा।”

“तुलवाऊंगा…तुलवाऊंगा…। छद दे। अब तो छद दे मुझे।”

“अच्छा, पहले अपना नाम बता।”

“दी…पत…।”

नाम सुन कर दीपाली ने उसे छोड दिया।

“और मेरा पता है, क्या नाम है?”

“आती?”

“आती तो ठीक है। मगर आंटी का नाम है दीपाली।” दीपाली ने उसके गाल को खींचा। दोनों मिल कर फूल तोड़ने लगे। उसे दीपाली से बातें करते देख, गेट की ओट में खड़े बाकी बच्चे भी धीरे-धीरे लॉन में आने लगे।

दीपाली के पूछने पर सभी ने अपना नाम, उम्र, स्कूल, जमात, सब कुछ बताया। दीपक की बारी आई। अन्य बच्चों से मालूम हुआ, वास्तव में दीपक उन सभी से बड़ा है। जल्दी ही उसका पन्द्रहवां जन्मदिन आने वाला है। बीमार होने के कारण वह सभी से छोटा लगता है।

“जब आप नहीं आए थे, तब हम रोज यहीं पर खेला करते थे। जब से आप आए, हमारा खेलना ही छूट गया।” बच्चों ने अपना दुख बताया।

“क्यों छुट गया?”

“बस यहीं पर खेलने की आदत है। यहां जगह भी काफी खुली है।”

“मगर मैंने तो किसी को खेलने से नहीं रोका। अब भी खेला करो।”

अनुमति मिलते ही बच्चे तालियां बजा कर उछलने लगे। दीपक को हंसते देख दीपाली को और भी मोह आया। वह उसके बालों में हाथ फिराते हुए लाड करने लगी। मोह में आ कर दीपक ने दीपाली की कमर में बांहें डाल दीं।

नीलू और गौरी रस्सा घुमाने लगी। घूमते रस्से में कूदते बच्चे को देख कर दीपाली का मन भी रस्सा कूदने को करने लगा।

उसे कूदते देख, दीपक हंसा और छलांग लगा कर कूदती दीपाली का हाथ पकड़ कर उसके बराबर कूदने लगा। उस जोड़ी ने ऐसा रस्सा कूदा कि गाड़ी की चीख तक बारी चलती रही।

बच्चों को अगले दिन का कह कर, उसने फूल पल्लू में भरे और पिछले दरवाजे से अंदर आ कर चिटकनी लगाई। जल्दी से खाना बना कर कमरा सजाने लगी।

हद हो गई।

फिर बाबू लाल आया। खाना खाया। दवा निगली और माला घुमाते हुए सो गया।

यह रात भी पहली रात-सी बीत गई। उसके बाद एक-एक करके कई रातें बीतने लगी। कोई भी रात सुहाग रात ना बनी। पति के अंदर क्या चल रहा था? कुछ समझ में नहीं आ रहा था।

फिर एक रात…।

अंदर घुलता जहर सिर को चढ़ने लगा। उस रात मेनका बनी दीपाली ने पहल कर दी।

धीरे-धीरे पति की पीठ सहलाते हुए। वह उसके सिर में अंगुलियां फिराते हुए सीने तक जा पहुंची। उस पत्थर पर असर ना हुआ। थक-हार कर दीपाली सो गई।

अजीब आदमी है। सोचों में गोता लगाते, उसने अगले दिन नाश्ता बनाया। सवालिया निशान बनी पति के पास जा बैठी। वह कुछ कहती, बाबू लाल गरज कर बोला, “यह क्या बनाया है? कितनी बार कहा है, और कुछ नहीं बनाया जाता तो अंडों की भुजी ही बना दिया करो। सुन्दर चेहरे को चाटना है भला। रत्ती भर भी अक्ल नहीं किसी काम की।” कह कर उसने थाली परे फेंक दी। दीपाली डर कर सिमट गई।

“जी, रोज अंडे मंगवाती हूं। बनाने लगती हूं तो खाली खोल निकलता है। अंडा होता ही नहीं।”

“तो क्या मैं पी जाता हूं अंडे। घर तो तुम्हारे हवाले है। लहू पी लिया साली ने। कहां से मुसीबत उठा लाया।” कहते हुए वह स्टेशन की ओर चल दिया।

“कौन किसे पी गया?” अपने नसीब पर खीझती, वह पति को खुश करने की कोशिशों में निढाल होने लगी।

बाबू लाल दोपहर तक खुर्राटे मारता रहता या माला फिराते हुए अंदर-बाहर जल के छींटे मारने लगता। जब तक वह घर पर रहता, दीपाली बाहर ना निकलती। ना ही क्वार्टरों के बच्चे उनके घर के सामने फटकते।

वह चार बजे का इंतजार करने लगी। जैसे ही बाबू लाल ड्यूटी पर जाता, दीपाली बच्चों के संग लॉन में खेलने लगती। कभी छुपन-छुपाई, कभी लंगड़ी शेर। रस्सा कूदते हुए वह चकरी ही बन जाती। हंसते-खेलते हुए बच्चों को उनकी मनसपसंद चीजें बना कर खिलाती। बच्चे उसके इर्द-गिर्द चक्कर लगाते। पगडंडी से गुजरती हर आंख उसकी ओर जरूर देखती। आने-बहाने भाभी-भाभी करता, उसका हमउम्र विक्की उसकी आंखों में झांकने की कोशिश करता। कई बार उसकी नजर दीपाली का कलेजा निकाल जाती। उसे मुस्कुराते देख, दिल हदें पार करने की जुगत बिठाता। कहां कोई उससे बात करने या एक झलक पाने को तरसता और कहां बाबू लाल को उससे क्या वैर था? उसे पल-पल सोच के नाग डसते।

विवाह हुए चौथा महीना शुरू हो गया। पति के पास आए भी उसे तीन महीने हो गए. मगर सहाग-सेज क्या होती है? उसे अभी भी पता नहीं।

“क्या लेना है, ऐसे स्टेशन बाबू से।” तिल-तिल मरती, वह अंदर ही अंदर कुम्हलाने लगी।

नसीब को कोसती पिछले आंगन में बैठी उलझन की जंग लड़ रही थी कि ध्यान रसोई के खुले दरवाजे से होते हुए शेल्फ पर छिक्के में पड़े अंडों की ओर चला गया। एक मोटा तगड़ा नेवला अंडे को मुंह लगाए बैठा था।

“शू…शू…।” करते हुए उसने शोर मचाया और नेवला भाग खड़ा हुआ। दीपाली ने देखा, नेवला सारा अंडा पी गया था।

अंडे का खोल, नेवला और बाबू लाल एक-दूसरे में घुल-मिल कर, उसके सिर में उत्पात मचाने लगे। बाबू लाल का उसे दीप कह कर पुकारना उसे जलाने लगा। एक खोल का भेद खुल गया और दूसरे खोल का खालीपन जानने के लिए उसने बाबू लाल की अलमारी की तलाशी ली। अनेक प्रकार की दवाइयां, डॉक्टरी पर्चियों का ढेर था। नाम-पता देखा। बाबू लाल का था। एक खुला कार्ड हाथ लगा। पढ़ने लगी। हिन्दी में कुछ पंक्तियां लिखी थी,

“किशोर अवस्था की गलतियां शक्ति निगल गईं। लगता है आपने जवानी में बहुत…। वीर्य…। इलाज के लिए खुद जांच करवाने आना पड़ेगा।”

उसने एक-एक करके अन्य पर्चियों को पढ़ा, ‘पुरुष हारमोन असंतुलित’, उम्र के साथ शारीरिक विकास मगर पुरुष अंग की धमनियां अविकसित। अपूर्ण पुरुष।”

खाली खोल से माथा मारती दीपाली का अपना आप खाली होने लगा। वह बार-बार रिपोर्ट पढ़ती गई। बाबू लाल की हाथी जैसी देह चूहा बन कर उसे भीतर से कुतरने लगी। वह कभी बाल नोंचती, कभी छाती पर हाथ मारने लगी।

उसके अंदर जहर भर गया। ना खाना बनाया, ना कमरा सजाया। वह जड़ से टूटी बेल-सी मुरझा गई।

देर रात बाबू लाल ने दरवाजे पर दस्तक दी। चुपचाप दरवाजा खोला। खाने की थाली ला कर मेज पर रख दी। बाबू लाल ने खाना खाया कि नहीं, भगवान जाने। दीपाली मुंह पर चादर लपेट कर सो गई।

बाबू लाल के खुर्राटे शांत। कमरे में पसरा सन्नाटा डराने लगा।

“दीपा…ली…। मैं तुम्हें…।” बाबू लाल ने आवाज दी। बात करने का हौसला जुटाया।

दीपाली शांत। ना हुंकार ना हिलजुल।

बाबू लाल ने उसे कंधे से झिंझोड़ा। दीपाली ने उसका हाथ झटक दिया और सीधी हो कर बैठ गई। पूरी आंखें खोल कर वह बाबू लाल को घूरने लगी। नथुने फूल गए। फूंकारती नागिन!

दीपाली का यह रूप बाबू लाल से सहन करना मुश्किल हो गया। उसे समझ में ना आया, क्या करे। माला पर हाथ जा पड़ा। उसे तोड़ डाला। दवा उठा कर परे फेंक दी।

“मुझे माफ कर देना दीपाली। कुदरत ने मेरे साथ खेल खेला। दुनिया के सभी इलाज हार गए। मैं पूर्ण हो कर भी अपूर्ण पुरुष हूं। मगर मैं तेरे कदमों में दुनिया के सारे सुख ढेर कर दूंगा। तुझे बच्चे प्यारे हैं, हम बच्चा गोद ले लेंगे। बस मेरा साथ दो। जो भेद मैंने दुनिया से छिपा कर रखा है, वो कमी…।” उसने घुटने टेक दिए। दीपाली को समझ ना आया, क्या जवाब दे। एक बार उसकी ओर देखा। फिर करवट ले ली।

कमरे में फैला भय, अंधेरा और सन्नाटा दोनों के भीतर फैलने लगा।

ना माला, ना मंत्रोच्चारण, ना मोरनी-सी चाल, ना नाज-नखरे! लगा, दोनों को चुप्पी ने निगल लिया हो।

ड्यूटी के समय बाबू लाल तैयार हुआ। हमेशा हंसने वाली, उसके आगे-पीछे घूमने वाली दीपाली आज लाश बनी अपने बिस्तर पर औंधे मुंह पड़ी रही। वह उसी प्रकार स्टेशन चला गया।

दीपाली ने अपने चेहरे पर हाथ फिराया। बाबू लाल का सफाचट चेहरा उसके भीतर उबकाई भरने लगा।

सब कुछ खाली। पति, घर, अपना अस्तित्व। खालीपन उसे काट खाने लगा।

मां-बाप को बताऊं? जीते-जी मर जाएंगे। ना बताया तो मैं मर जाऊं? मगर मेरा क्या कसूर। मुझे क्यों सजा मिले? खुद संग संवाद रचाते हुए, विचारों के भंवर में उलझी दीपाली अपना सामान बांधने लगी। अंदर-बाहर भी उसका रोना थम नहीं रहा था।

कालोनी की पगडंडी से होते हुए बच्चे पीछे लॉन की ओर बढ़ने लगे।

आखिरी बार बच्चों संग बच्चा बन जाने का दिल चाहा। दीपक को बच्चों ने घेर रखा था। दिल चाहा, हर एक के गले से लग रो ले। वह धीरे-धीरे चलते हुए बच्चों के पीछे जा खड़ी हुई और कान लगा कर उन की बातें सुनने लगी। मालूम हुआ, कालोनी के सारे बच्चे सर्कस देख कर आए थे। बच्चे दीपक से बार-बार पूछ रहे थे, “सर्कस में सब से बढ़िया क्या लगा?”

वह सारा जोर लगा कर बोला, “सर्कस वाली आंती।” वह तालियां लगा कर हंसने लगा।

“वह क्यों?”

“सर्कस वाली आंती के पत्त। शच्ची उसके पत्त (पट/जांघ) आंती जैसे थे।”

“तुम्हें कैसे मालूम?” बच्चों ने पूछा।

“जब दीपाली आंती चलती आ ना कस आली आंती जैसे दीपाली आंती के पत्त थल-थल करते हैं। नम्र…नम्र…।”

बच्चों की गुफ्तगू सुनती दीपाली, दीपक को पकड़ने के लिए बढ़ी तो सभी बच्चे भागने लगे।

“मैंने हलवा बनाया है।” दीपाली की आवाज सुन कर बच्चे वहीं रुक गए।

आगे बढ़ कर, दीपाली ने दीपक को उठाया और लॉन में रखी कुर्सी पर बैठ, उसे गोदी में बिठा लिया। वह दीपाली की जांघों पर कूदने लगा। गौरी और नीलू ने रस्से के सिरे संभाल लिए। दीपक और दीपाली उसमें छलांग लगाते हुए कूद पड़े। दोनों लगातार कूदते रहे। आज आखिरी से पहली गाड़ी चीखती हुई निकल गई।

सूरज ढल गया और आखिरी गाड़ियां भी निकल गईं।

“दीप…ओ दीप…।” बाबू लाल और राम दयाल आवाजें लगाते रहे परन्तु हाथों में हाथ डाले दीपक और दीपाली रस्सा कूदते हुए डटे रहे।

बाबू लाल तेजी से आगे बढ़ा। उसने दीपाली को घूरा। चकरी बनी कुरती की झालर में कोई हिचकोल न आई।

बेरी के नीचे नाग-नागिन की खेल और लॉन में दीपक और दीपाली की कूद-फांद। क्रोध में बाबू लाल ने दोनों को घूरा। अंदर गया। तौलिया लाकर दीपाली के मुंह पर दे मारा। डर से बच्चों ने खेलना बंद कर दिया।

दीपाली ने तौलिया लिया, बाबू लाल की आंखों में झांकते हुए, हांफते दीपक का पसीने से भीगा चेहरा पोंछते हुए उसकी गाल को सहलाया। नाग-नागिन की ओर देख कर मुस्कुराई। दीपक के बालों में हाथ फिराते हुए उसका माथा चूम लिया।

दीपाली का तना सीना। चेहरे पर उभरती लाली…।

बाबू लाल के अंदर आग सुलगने लगी। उसने गुस्से से भर कर, दरवाजे के पीछे रखे डंडे को उठाया और नाग-नागिन की ओर निशाना साधा।

ठससे पहले कि बाबू लाल वार करता दीपाली उसके आगे डट कर खड़ी हो गई। हाथ में पकड़े तौलिए को जोर से फटका और गर्दन अकड़ा कर बरौनियां उठा कर बोली, “हूं…।”

बाबू लाल की जान सूख गई। अंदर की कमजोरी देह पर भारी पड़ गई। डंडा उठाए ही वह सिर के बल जमीन पर जा गिरा।

पगडंडी पर खड़ा विक्की लॉन की ओर बढ़ने लगा। उसे अपनी ओर आते देख, दीपाली पलक झपकते ही तेजी से उठी और जमीन पर गिरे डंडे को विक्की के टखनों पर दे मारा। वह लंगडाते हुए उल्टे पांव भाग निकला।

दीपाली का यह रूप देख कर बच्चे अपने-अपने घर की ओर भागने लगे। दीपक भी फांदते हुए उनके पीछे चल दिया। उसे जाता देख, भीतर से बलखाती नागिन ने फन उठाया। दिल में आया, उसे कमर से पकड़ कर, एक चक्कर लगा कर, उसे सीने से लगा ले। वह मुस्कुराई, फिर फफक पड़ी। फन फैलाए नाग-नागिन एक-दूसरे में मस्त। दीपाली ने हाथ में पकड़े तौलिए को होंठों से छू कर, कुंडली मारे मस्त नाग-नागिन पर पटक दिया।

जमीन पर गिरे बाबू लाल के पास से होकर झाड़ियों में जाते सांप को देख कर राम दयाल जोर से चीखते हुए उसकी ओर भागा, “बाबू लाल को सांप ने डस लिया।”

“नागिन!” बाबू लाल ने दीपाली की ओर देख कर कहा और उसका सिर जमीन से जा लगा।

भारत की आजादी के 75 वर्ष (अमृत महोत्सव) पूर्ण होने पर डायमंड बुक्स द्वारा ‘भारत कथा मालाभारत की आजादी के 75 वर्ष (अमृत महोत्सव) पूर्ण होने पर डायमंड बुक्स द्वारा ‘भारत कथा माला’ का अद्भुत प्रकाशन।’



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