छत्तीसगढ़

जनगणना टालने का दुष्परिणाम: कम से कम 10 करोड़ लोग हो गए पीडीएस दायरे से बाहर



कोविड-19 महामारी के दो वर्षों के दौरान, खास तौर पर तब जब लॉकडाउन लगा हुआ था, लाखों प्रवासी मजदूरों को पैदल अपने गांव जाने के लिए मजबूर होना पड़ा। जिन शहरों में वे रोज कमाकर गुजर-बसर कर रहे थे, वहां उनके लिए आय के साधन सूख गए थे और इसलिए उनके सामने रहने-खाने का संकट खड़ा हो गया था। इन ग्रामीण प्रवासियों में से ज्यादातर के पास अपने घरों पर राशन कार्ड थे; लेकिन उन राज्यों को जहां वे मजदूरी कर रहे थे, लॉकडाउन के दौरान उन तक राशन पहुंचाने में काफी दिक्कतें आईं।

वापस आते हैं सीतारमण के ट्ववीट पर। अक्सर यह बात चर्चा में आती है कि मोदी सरकार प्रधानमंत्री गरीब कल्याण अन्न योजना योजना को बढ़ाने पर विचार कर रही है। उन्हें लगता होगा कि इस स्कीम को खत्म करना उन्हें राजनीतिक तौर पर भारी पड़ सकता है। लेकिन इसे जारी रखने की एक आर्थिक कीमत भी तो है! इस योजना को अप्रैल, 2020 में अंत्योदय अन्न योजना के तहत अत्यंत गरीबों को मुफ्त भोजन उपलब्ध कराने के लिए शुरू किया गया था। खाद्य पदार्थों की कीमतों के पिछले कई वर्षों के दौरान लगभग स्थिर रहने के बाद भी खाद्य/मूल्य सुरक्षा के मोर्चे पर यह मोदी सरकार की अब तक की सबसे बड़ी परीक्षा साबित हो सकती है। खाद्य पदार्थ की राजनीतिक अर्थव्यवस्था बेहद संवदेनशील होती है: एक गलत निर्णय राशन पर निर्भर लोगों को नुकसान पहुंचा सकता है और इसका राजनीतिक झटका सत्तारूढ़ दल को लग सकता है।

दूसरी ओर, खाद्य सुरक्षा बजट के लिए पैसे की व्यवस्था की अपनी चुनौतियां होती हैं। इससे भी ज्यादा गंभीर बात यह है कि पीडीएस के जरिये अत्यधिक सब्सिडी पर अन्न उपलब्ध कराने के बाद भी गरीबों, खास तौर पर महिलाओं और बच्चों में पोषण का स्तर अब भी चिंता का कारण बना हुआ है। महाशक्ति बनने की चाहत रखने वाले राष्ट्र के लिए इसे शुभ संकेत तो नहीं ही कहा जा सकता।

(जयदीप हार्दिकर नागपुर के पत्रकार और ‘रामराव: द स्टोरी ऑफ इंडियाज फार्म क्राइसिस’ के लेखक हैं)



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